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मिथुन लग्न में रत्न सूर्य तीसरे भाव का स्‍वामी होता है। अत: इस कुंडली में माणिक्‍य धारण करना कभी भी लाभकारी नहीं होगा।2:...
17/09/2020

मिथुन लग्न में रत्न सूर्य तीसरे भाव का स्‍वामी होता है। अत: इस कुंडली में माणिक्‍य धारण करना कभी भी लाभकारी नहीं होगा।
2: मिथुन लग्न में चंद्र दूसरे स्‍थान का स्‍वामी है जिसे धन भाव भी कहते हैं। चंद्र की महादशा में तो किसी भी लग्न का जातक मोती धारण कर सकता है लेकिन ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्‍यक नहीं है क्‍योंकि मिथुन लग्न के लिए चंद्रमा मार्केश है लेकिन इसके बाद भी यदि चंद्रमा दूसरे भाव का स्‍वामी होकर नौवें, दसवें या फिर ग्‍यारवें भाव में हो तो मोती पहना जा सकता है या दूसरे भाव में चंद्रमा कर्क राशि के साथ स्‍वराशि का होकर बैठा हो तो धन लाभ के लिए मोती धारण किया जा सकता है।
3: मिथुन लग्न में मंगल छठें और ग्‍यारवें भाव का स्‍वामी होता है। लग्न स्‍वामी बुध और मंगल के बीच परम शत्रुता होने के कारण इस लग्न के जातक को मूंगा धारण नहीं करना चाहिए। विशेषकर मंगल की महादशा में तो मूंगा पहनना बेहद हानिकारक होगा।
4: मिथुन लग्न में बुध चतुर्थभाव का स्‍वामी होता है। इस लग्न के व्‍यक्‍ति‍यों को पन्‍ना अवश्‍य धारण करना चाहिए क्‍योंकि यह कष्‍ट और विपत्ति से बचने के लिए उनकी सहायता करता है। बुध की महादशा में इस लग्‍न के लिए पन्‍ना विशेष लाभकारी होगा।
5: मिथुन लग्न में बृहस्‍पति सातवें और दशवें भाव का स्‍वामी होता है। इस कारण यह केद्रपति दोष से दूषित होता है। इसके बाद भी अगर गुरू लग्न, दूसरे, ग्‍यारवें या किसी केंद्र भाव में हो तो उसकी महादशा में पुखराज का पहना जा सकता है। इससे धन और संतान-सुख प्राप्‍त होगा। लेकिन यह ध्‍यान रखना जरूरी है कि मिथुन लग्‍न में गुरू प्रबल मारकेश है अत: धन व सांसारिक सुख देने के बाद भी यह मारक बन जाता है। इसलिए यदि बहुत आवश्‍यक न हो मिथुन लग्‍न में पुखराज न धारण करें।
6: मिथुन लग्न में शुक्र पांचवें और बारहवें भाव का स्‍वामी है। पांचवें भाव में शुक्र की मूल राशि होती है अत: इस लग्न के लिए शुक्र शुभ माना गया हे। लेकिन मिथुन लग्न के स्‍वामी बुध और शुक्र में मित्रता होती है इसलिए सिर्फ मिथुन लग्न वालों को सुख, बुद्धि, बल, यश-कीर्ति, मान-सम्‍मान तथा भाग्‍योदय के लिए सिर्फ शुक्र की महादशा में ही हीरा पहनना चाहिए। इतना ही नहीं यदि हीरे को पन्‍ने के साथ धारण करेंगे तो असाधारण फल प्राप्‍त होंगे।
7: मिथुन लग्न में शनि आठवें और नौवें भाव का स्‍वामी होता है। नौवें भाव का स्‍वामी होने से शनि इस राशि के लिए शुभ ग्रह है। इसलिए पन्‍ना पहना जा सकता है। यदि शनि की महादशा में मिथुल लग्न वाले नीलम धारण करें तो अच्‍छे फल मिलेंगे। पन्‍ने के साथ नीलम पहनने पर इस लग्‍न के जातक असाधारण फल प्राप्‍त कर सकते हैं।
इस लगन के लिए ९ ग्रहों का फलादेश
सूर्य- भ्राता, बहना, भुजबल, तेज़, साहस, और शक्ति के गुण ।
चन्द्र- पैसा, परिवार, मनोबल और घिराव ।
मंगल- आय, बीमारी, दुश्मन और मेहनत आदि ।
बुध- देह का स्वरूप, आत्मा का बल, माता, जमीं जायदाद आदि
गुरु- पति या पत्नी, जीविका का साधन , राजधर्म, कारोबार, मान सन्मान, और दिल की मजबूती ।
शुक्र- पढ़ाई, बोलचाल, बच्चे और निपुणता ।
शनि- उम्र, डर, भाग्य और धर्म ।
राहु- छुपी हुई चालाकी, चिता, ज्यादा लाभ प्रप्ति।
केतु- कष्ट और अप्राप्य वस्तुओं की प्राप्ति आदि ।
इस लगन का बुध यदि मार्गी हो तब पन्ना धारण करने से लाभ मिलता है अगर बुध वक्री है तब पन्ना धारण नहीं करना चाहिए ।

पन्ना रत्न धारण करने से पहले इस बात का सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए की रत्न को उसी के नक्षत्र में धारण करना चाहिए । जैसे की पन्ना को बुध के नक्षत्र में जैसे की आश्लेषा ज्येष्ठा रेवती में या बुधवार या बुधपुष्य नक्षत्र धारण बुध के होरे में धारण करना चाहिए इस बात ध्यान रखना चाहिए कि उस समय राहु काल ना हो

बुध मंत्र ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च।
अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।।
जप समय मध्याह्न काल
बुध स्तुति जय शशिनन्दन बुध महाराजा। करहु सकल जन कहं शुभ काजा।।
दीजै बुद्धि सुमति बल ज्ञाना। कठिन कष्ट हरि हरि कल्याना।।
हे तारासुत रोहिणि नन्दन। चन्द्र सुवन दुःख दूरि निकन्दन।।
पूजहू आसदास कहं स्वामी। प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी।।

बुध ग्रह का मंत्र ॐ नमो अर्हते भगवते श्रीमते मल्लि तीर्थंकराय कुबेरयक्ष |
अपराजिता यक्षी सहिताय ॐ आं क्रों ह्रीं ह्र: बुधमहाग्रह मम दुष्‍टग्रह,
रोग कष्‍ट निवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट् || 14000 जाप्‍य ||
मध्‍यम यंत्र -ॐ ह्रौं क्रौं आं श्रीं बुधग्रहारिष्‍ट निवारक श्री विमल अनन्‍तधर्म शान्ति कुन्‍थअरहनमिवर्धमान अष्‍टजिनेन्‍द्रेभ्‍यो नम: शान्तिं कुरू कुरू स्‍वाहा || 8000 जाप्‍य ||
लघु मंत्र- ॐ ह्रीं णमो उवज्‍झायाणां || 10000 जाप्‍य ||
तान्त्रिक मंत्र- ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम: || 9000 जाप्‍य

10  मुंखी रुद्राक्ष
15/09/2020

10 मुंखी रुद्राक्ष

9 मुंखी रुद्राक्ष
15/09/2020

9 मुंखी रुद्राक्ष

मेष लग्न 1 माणिक्य  सूर्य पंचमेश त्रिकोण का स्वामी है और लग्नेश मंगल का मित्र है अतः मेष लग्न के जातक को बुद्धि बल प्राप...
08/09/2020

मेष लग्न
1 माणिक्य सूर्य पंचमेश त्रिकोण का स्वामी है और लग्नेश मंगल का मित्र है अतः मेष लग्न के जातक को बुद्धि बल प्राप्त करने के लिए संतान सुख प्रसिद्धि राज्य कृपा प्राप्ति के लिए सदा माणिक धारण करना चाहिये सूर्य की महादशा में इसको धारण करना अत्यंत लाभदायक होता है ।
अगर साढ़ेसाती है तो माणिक्य धारण नहीं करना चाहिये।

2 चंद्रमा चतुर्थ का स्वामी है अतः मोती धारण करने से मेष लग्न के जातक मानसिक सुख शांति मात्र शुभ लाभ आदि प्राप्त करता है मोती चंद्र की दशा में विशेष रूप में लाभदायक रहता है यदि मोती लग्नेश मंगल के रत्न मूंगे के साथ पहना जाए तो और भी अधिक लाभ कारक होता है

3 मंगल लग्न का स्वामी है। अतः मेष लग्न के जातक को मुंगा आजीवन धारण करना चाहिए मूंगा धारण करने से आयु बुद्धि स्वास्थ्य उन्नति मान प्राप्त होता है। तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है मुंगा आपका जीवन रत्न है। इसे आजीवन धारण कर सकते हैं।

4 बुध दो अनिष्ट भावों का स्वामी है तीसरे तथा छठे स्थान का स्वामी है लग्न के जातक को पन्ना लाभदायक होगा अतः बुध की महादशा में पन्ना धारण कर सकते हैं बुध सूर्य का मित्र होने से पंचम का भी स्वामी होने से बुद्ध का पन्ना पहन सकते हैं

5 बृहस्पति नवम त्रिकोण और द्वादश भाव का स्वामी है नवम भाग्य का स्वामी होने के कारण बृहस्पति इस लग्न के लिए शुभ ग्रह माना गया है पुखराज धारण करने से जातक की बुद्धि बल ज्ञान विद्या में उन्नति धन मान प्रतिष्ठा तथा भाग्य में उन्नति होती है इस की महादशा में पुखराज धारण करना ज्यादा लाभकारी सिद्ध होगा यदि इसे मूंगे के साथ धारण किया जाए तो बहुत लाभप्रद है। चंद्रमा अगर चतुर्थ स्थान में बैठा है।
तो पुखराज मोती और मुंगा तीनों धारण कर सकते है।

6 शुक्र दूसरा और सातवे स्थान का स्वामी होने के कारण मार्केश है। मंगल का इसके अतिरिक्त लग्नेश मंगल और शुक्र में परस्पर मित्रता नहीं है। शुक्र दूसरे स्थान में उच का हो तो धन प्राप्ति के लिए शुक्र की महादशा में हीरा धारण कर सकते है।कुंडली में यदि शुक्र स्व ग्रही अपनी उच्च राशि में हो या शुभ स्थिति में शुक्र की महादशा में हीरा धारण से धन प्राप्ति दांपत्य सुख विवाह सुख की प्राप्ति हो सकती है।परंतु कभी कभी मारक भी हो सकता है।

7 शनि नीलम लग्न के लिए दशमेष व्यापार और एकादश लाभेश का स्वामी है। दोनों शुभ भाव है एकादश भाव के स्वामित्व के कारण शनी को लग्न के लिए शुभ ग्रह नहीं माना गया है ।परंतु शनि यदि द्वितीय चतुर्थ पंचम नवम दशम एकादश या लग्न में स्थित हो तो शनि की महादशा में नीलम धारण करने से हर दिशा में लाभ मिलता है।

8 संतान या बुद्धि के लिए लग्न के लिए संयुक्त रत्न संतान प्राप्ति के लिए माणिक्य सव्वा चार कैरेट से सव्वा पांच कैरेट या रत्ती।मुंगा सव्वा पांच कैरेट से सव्वा आठ रत्ती के बीच मे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।

9 भाग्योदय के लिए पुखराज सव्वा चार कैरेट से सव्वा आठ कैरेट या रत्ती के बीचमे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।
मुंगा सव्वा चार कैरेट से सव्वा आठ कैरेट या रत्ती के बीच मे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।

10 स्वास्थ्य हेतु मुंगा सव्वा चार कैरेट से सव्वा पांच कैरेट या रत्ती।
माणिक्य सव्वा चार कैरेट से सव्वा आठ कैरेट या रत्ती के बीचमे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।

11 स्थाई लक्ष्मी या अपार धन के लिए हीरा आधा कैरेट से लेकर सव्वा कैरेट या रत्ती के बीचमे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।
पुखराज सव्वा चार कैरेट से सव्वा आठ कैरेट या रत्ती के बीचमे जो भी वजन का मिले तो पहेन सकते है।

12 मंत्र भौम ॐ अं अंङ्गारकाय नम: ।। ॐ हूं श्रीं भौमाय नम:।।मंगल : ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:ॐ अग्निमूर्धादिव: ककुत्पति: पृथिव्यअयम। अपा रेता सिजिन्नवति ।

13 ॐ हां हंस: खं ख: ॐ हूं श्रीं मंगलाय नम: ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:"

14 ॐ अं अंगारकाय नम: ॐ भौं भौमाय नम:

15 ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युतकान्तिसमप्रभम । कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम ।। ॐ क्षिति पुत्राय विदमहे लोहितांगाय धीमहि-तन्नो भौम: प्रचोदयात

16 भाग्यशाली रत्न सोने अथवा तांबे की अंगूठी में मूंगा सवा आठ रत्ती का मंगलवार को शक्कर एवं शुद्ध जल मिश्रित गंगा जल में डालकर निम्न मंत्र पढ़ते हुए कम से कम 8 बार डुबोये।

17मंत्र ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

18 मुंगा रत्न धारण करने से पहले इस बात का सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए की रत्न को उसी के नक्षत्र में धारण करना चाहिए । जैसे की मुंगा को मंगल के नक्षत्र में जैसे की मृगशिरा मघा धनिष्ठा में या मंगलवार या मंगलपुष्य नक्षत्र धारण मंगल के होरे में या कोई पुष्य नक्षत्र या धारण करना चाहिए इस बात ध्यान रखना चाहिए कि उस समय राहु काल ना हो

सिंह लग्न का रत्न माणिक सिंह लग्न में रत्न माणिक्य रत्न माणिक्य रत्न सूर्य रत्न है और सूर्य को आत्मा कहा गया है. आईये मा...
03/09/2020

सिंह लग्न का रत्न माणिक सिंह लग्न में रत्न माणिक्य रत्न
माणिक्य रत्न सूर्य रत्न है और सूर्य को आत्मा कहा गया है. आईये माणिक्य रत्न किन व्यक्तियों को धारण करना चाहिए. और कौन से व्यक्ति इस रत्न को कदापि धारण न करें, इस विषय पर विचार करते है.
मेष लग्न-माणिक्य रत्न
मेष लग्न के लिये सूर्य पंचम भाव यानि त्रिकोण भाव का स्वामी है. और साथ ही ये लग्नेश मंगल के मित्र भी होते है. अत: मेष लग्न के व्यक्तियों के लिये माणिक्य रत्न धारण करना विधा क्षेत्र की बाधाओं को दूर करने में सहयोग करेगा. इसके रत्न के प्रभाव से मेष लग्न के व्यक्ति को बुद्धि कार्यो में रुचि बढती है. यह रत्न इन्हें आत्मोन्नति के लिये, संतान प्राप्ति के लिये, प्रसिद्धि, राज्यकृ्पा प्राप्ति के लिये मेष लग्न के व्यक्तियों को सदैव धारण करना चाहिए.
वृषभ लग्न के लिये माणिक्य रत्न
वृषभ लग्न के लिये सूर्य चतुर्थ भाव के स्वामी है. परन्तु यहां सूर्य लग्नेश शुक्र के मित्र न होकर, शत्रु है. वृषभ लग्न के व्यक्ति को माणिक्य रत्न केवल सूर्य महादशा में धारण करना चाहिए. वृ्षभ लग्न के लिये सूर्य रत्न माणिक्य महादशा अवधि में सुख-शान्ति, मातृ्सुख और भूमि सुख में वृ्द्धि करता है.
मिथुन लग्न के लिये माणिक्य रत्न .
इस लग्न के लिये सूर्य तीसरे घर के स्वामी है. इसलिये माणिक्य रत्न धारण करना मिथुन लग्न के व्यक्तियों के लिये कभी भी लाभकारी नहीं रहेगा.
कर्क लग्न के लिये माणिक्य रत्न
इस लग्न के व्यक्तिओं के लिए सूर्य दूसरे भाव यानि धन भाव का स्वामी है. साथ ही इस लग्न के लिये यह लग्नेश चन्द्र का मित्र भी है. अत: धन संचय करने के लिये माणिक्य रत्न धारण किया जा सकता है. परन्तु दूसरा भाव मारक भाव भी है. अर्थात कुछ शारीरिक कष्ट बढ सकते है. इसलिए वृ्षभ लग्न के लिये उतम रहेगा, मोती धारण करना इसकी तुलना में अधिक शुभ रहेगा.
सिंह लग्न के लिये माणिक्य रत्न
सिंह लग्न का स्वामी सूर्य स्वयं है. इस लग्न के व्यक्तियों को आजीवन रत्न धारण करना चाहिए. इससे शत्रु को परास्त करने में सफलता मिलेगी,शारीरिक व मानसिक स्वास्थय की वृ्द्धि होगी, आयु में वृ्द्धि होगी व यह रत्न मानसिक संतुलन बनाये रखने में भी सहायता करेगा.
कन्या लग्न के लिये माणिक्य रत्न
कन्या लग्न के व्यक्तियों को माणिक्य रत्न कभी भी धारण नहीं करना चाहिए. इस लग्न के लिये सूर्य 12 वें भाव के स्वामी होते है.
तुला लग्न के लिये माणिक्य रत्न
तुला लग्न के सूर्य आय भाव के स्वामी होते है. और लग्नेश शुक्र के शत्रु भी. इस कारण से इसे केवल सूर्य महादशा में धारण करना अनुकुल रहता है. अन्यथा पन्ना धारण करना तुला लग्न के इनके लिये विशेष शुभ रहता है.
वृश्चिक लग्न के लिये माणिक्य रत्न
इस लग्न के लिये सूर्य दशम भाव के स्वामी है. व लग्नेश मंगल के मित्र भी है. इसलिए इस लग्न के व्यक्तियों के लिये माणिक्य रत्न राज्यकृ्पा, मानप्रतिष्ठा तथा नौकरी, व्यवसाय में उन्नति देता है.
धनु लग्न के लिये माणिक्य रत्न
धनु लग्न में सूर्य नवम भाव यानि भाग्य भाव के स्वामी है. इसके अतिरिक्त ये लग्नेश गुरु के मित्र भी है. धनु लग्न के व्यक्तियों का माणिक्य रत्न धारण करना सर्वश्रेष्ठ शुभ फल देता है. इसे धारण करने से इन्हें जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति में सहायता मिलती है. भाग्य वृ्द्धि और पिता सुख में सहयोग मिलता है.
मकर लग्न के लिये माणिक्य रत्न
इस लग्न के लिये सूर्य अष्टम भाव के स्वामी है. लग्नेश शनि के शत्रु भी है. मकर लग्न के व्यक्ति माणिक्य रत्न कभी भी धारण न करें.
कुम्भ लग्न के लिये माणिक्य रत्न
कुम्भ लग्न के लिये सूर्य सप्तम भाव के स्वामी है. लग्नेश शनि से इनकी शत्रुता भी है. इसलिये जहां तक संभव हो इन्हें माणिक्य रत्न धारण करने से बचना चाहिए.
मीन लग्न के लिये माणिक्य रत्न
मीन लग्न के लिये सूर्य छठे भाव यानि रोग भाव के स्वामी है. लग्नेश गुरु के मित्र है. विशेष परिस्थितियों में भी केवल सूर्य महादशा में ही माणिक्य रत्न धारण करें. अन्यथा इसे धारण करना शुभ नहीं है.
माणिक्य रत्न के साथ क्या पहने
माणिक्य रत्न धारण करने वाला व्यक्ति इसके साथ में मोती, मूंगा और पुखराज या इन्हीं रत्नों के उपरत्न धारण कर सकता है.
माणिक्य रत्न के साथ क्या न पहने
माणिक्य रत्न के साथ कभी भी एक ही समय में हीरा, नीलम या पन्ना धारण नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त माणिक्य रत्न के साथ इन्ही रत्नों के उपरत्न धारण करना भी शुभ फलकारी नहीं रहता है.

लग्न स्वामी : सूर्य
लग्न तत्व: अग्नि
लग्न चिन्ह: सिंह
लग्न स्वरुप: स्थिर
लग्न स्वभाव: क्रूर
लग्न उदय: पूर्व
लग्न प्रकृति: पित्त प्रकृति
जीवन रत्न:माणिक
अराध्य: सूर्य
लग्न गुण: सतोगुण
अनुकूल रंग:पीला, भगवा, श्वेत
लग्न जाति: ब्राह्मण
शुभ दिन: सोमवार
शुभ अंक:1
जातक विशेषता:अति आत्मविश्वासी
मित्र लग्न :मिथुन,मेष,कन्या,धनु,
शत्रु लग्न : वृष,तुला
लग्न लिंग: पुरुष

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि !तन्नो सूर्य प्रचोदयात !
ॐ अश्वाद्वाजय विद्महे पासहस्थाया धीमहि !तन्नो सूर्य प्रचोदयात !
सूर्य देव की शांति हेतु उपाय :
मंत्र जाप : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः जप संख्या २८०००

रुद्राक्ष 1. से 14. मुखी रुद्राक्ष, रुद्राक्ष पहने के लाभ का अर्थ ही कल्याण है तो यह रुद्राक्ष कल्याण के लिए ही धरती पर ...
25/07/2020

रुद्राक्ष 1. से 14. मुखी रुद्राक्ष,
रुद्राक्ष पहने के लाभ का अर्थ ही कल्याण है तो यह रुद्राक्ष कल्याण के लिए ही धरती पर आया है।
इसके अनेक नाम हैं रुद्राक्ष, शिवाक्ष, भूतनाशक, पावन, नीलकंठाक्ष, हराक्ष, शिवप्रिय, तृणमेरु, अमर, पुष्पचामर, रुद्रक, रुद्राक्य, अक्कम, रूद्रचल्लू आदि।
रुद्राक्ष की खासियत यह है कि इसमें एक अनोखे तरह का स्पदंन होता है।
जो आपके लिए ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच बना देता है, जिससे बाहरी ऊर्जाएं आपको परेशान नहीं कर पातीं |
हर इच्छा की पूर्ति करता है रुद्राक्ष - कहते हैं भगवान शिव को प्रसन्न करना बेहद आसान है।
वह इतने भोले हैं कि जो भी उन्हें मन से याद करता है वह उसकी हर इच्छा को पूरी करते हैं।
शायद यही वजह है कि विनाशक की भूमिका निभाने वाले भगवान शिव को उनके भक्त भोलेनाथ कहते हैं।
रुद्र का मतलब भगवान शंकर (शिव) है। अक्ष आंख को कहते हैं।
माना जाता है कि रुद्राक्ष इंसान को हर तरह की हानिकारक ऊर्जा से बचाता है।
इसका इस्तेमाल सिर्फ तपस्वियों के लिए ही नहीं, बल्कि सांसारिक जीवन में रह रहे लोगों के लिए भी किया जाता है।
जानिए, कैसे इंसानी जीवन में नकारात्मकता को कम करने में मदद करता है रुद्राक्ष:
रुद्राक्ष वृक्ष और फल दोनों ही पूजनीय हैं। मानव के अनेकों रोग, शोक, बाधा नष्ट करने की शक्ति रुद्राक्ष में है।
इसमें चुम्बकीय और विद्युत ऊर्जा से शरीर को रुद्राक्ष का अलग-अलग लाभ होता है।
रुद्राक्ष की खासियत यह है कि इसमें एक अनोखे तरह का स्पदंन होता है। जो आपके लिए आप की ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच बना देता है, जिससे बाहरी ऊर्जाएं आपको परेशान नहीं कर पातीं।
इसीलिए रुद्राक्ष ऐसे लोगों के लिए बेहद अच्छा है जिन्हें लगातार यात्रा में होने की वजह से अलग-अलग जगहों पर रहना पड़ता है।
आपने गौर किया होगा कि जब आप कहीं बाहर जाते हैं, तो कुछ जगहों पर तो आपको फौरन नींद आ जाती है, लेकिन कुछ जगहों पर बेहद थके होने के बावजूद आप सो नहीं पाते।
इसकी वजह यह है कि अगर आपके आसपास का माहौल आपकी ऊर्जा के अनुकूल नहीं हुआ तो आपका उस जगह ठहरना मुश्किल हो जाएगा।
चूंकि साधु-संन्यासी लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं, इसलिए बदली हुई जगह और स्थितियों में उनको तकलीफ हो सकती है।
उनका मानना था कि एक ही स्थान पर कभी दोबारा नहीं ठहरना चाहिए। इसीलिए वे हमेशा रुद्राक्ष पहने रहते थे।
आज के दौर में भी लोग अपने काम के सिलसिले में यात्रा करते और कई अलग-अलग जगहों पर खाते और सोते हैं।
जब कोई इंसान लगातार यात्रा में रहता है या अपनी जगह बदलता रहता है, तो उसके लिए रुद्राक्ष बहुत सहायक होता है।
रुद्राक्ष नकारात्मक ऊर्जा के बचने के एक असरदार कवच की तरह काम करता है।
कुछ लोग नकारात्मक शक्ति का इस्तेमाल करके दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह अपने आप में एक अलग विज्ञान है।
अथर्व वेद में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ऊर्जा को अपने फायदे और दूसरों के अहित के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।
रुद्राक्ष एक खास तरह के पेड़ का बीज है। ये पेड़ आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में एक खास ऊंचाई पर, खासकर हिमालय और पश्चिमी घाट सहित कुछ और जगहों पर भी पाए जाते हैं।
रुद्राक्ष धारण करने से पूर्व पूजाकर्म और जाप करना होता है, लेकिन सामान्य हालातों में इसे संभव कह पाना मुश्किल है इसलिए जब भी आपको रुद्राक्ष धारण करने का मन करे या ज्योतिष आपको सलाह दे तो सर्वप्रथम यह ध्यान रखें कि धारण करने का दिन सोमवार ही हो।
पहनने से पहले रुद्राक्ष को कच्चे दूध, गंगा जल, से पवित्र करें और फिर केसर, धूप और सुगंधित पुष्पों से शिव पूजा करने के बाद ही इसे धारण करें।

एक मुखी रुद्राक्ष - 1
एकमुखी रुद्राक्ष दुर्लभ माना जाता है | एक मुखी रुद्राक्ष को शिव के सबसे करीब माना जाता है।
वे लोग जो धन-दौलत और भौतिक चीजों का मोह रखते हैं उन्हें एक मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
रुद्राक्ष धारण करने से पहले ऊँ ह्रीं नम: मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप 108 बार (एक माला) करना चाहिए तथा इसको सोमवार के दिन धारण करें।
इसका मूल्य विशेषतः अत्यधिक होता है। यह अभय लक्ष्मी दिलाता है। इसके धारण करने पर सूर्य जनित दोषों का निवारण होता है।
नेत्र संबंधी रोग, सिर दर्द, हृदय का दौरा, पेट तथा हड्डी संबंधित रोगों के निवारण हेतु इसको धारण करना चाहिए। यह यश और शक्ति प्रदान करता है।
इसे धारण करने से आध्यात्मिक उन्नति, एकाग्रता, सांसारिक, शारीरिक, मानसिक तथा दैविक कष्टों से छुटकारा, मनोबल में वृद्धि होती है।
कर्क, सिंह और मेष राशि वाले इसे माला रूप में धारण अवश्य करें।
दो मुखी रुद्राक्ष - 2
शिव का यह रुद्राक्ष हर इच्छा पूरी करता है।दोमुखी रुद्राक्ष को देवदेवेश्वर कहा गया है। सभी प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इसे धारण करना चाहिए।
इसे धारण करते समय ॐ नम: का जाप करना चहिए।
यह चंद्रमा के कारण उत्पन्न प्रतिकूलता के लिए धारण किया जाता है।
हृदय, फेफड़ों, मस्तिष्क, गुर्दों तथा नेत्र रोगों में इसे धारण करने पर लाभ पहुंचता है। यह ध्यान लगाने में सहायक है।
इसे धारण करने से सौहार्द्र लक्ष्मी का वास रहता है। इससे भगवान अर्द्धनारीश्वर प्रसन्न होते हैं।
उसकी ऊर्जा से सांसारिक बाधाएं तथा दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है दूर होती हैं।
इसे इस्त्रियों के लिए उपयोगी माना गया है। संतान जन्म, गर्भ रक्षा तथा मिर्गी रोग के लिए उपयोगी माना गया है।
आरोग्यता तथा दीर्घायु प्राप्ति के लिए वृष व तुला राशि तथा मिथुन, कन्या, मकर व कुंभ लग्न वाले जातक इसे धारण कर लाभ उठा सकते हैं।
धनु व कन्या राशि वाले तथा कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न वालों के लिए इसे धारण करना लाभप्रद होता है।

तीन मुखी रुद्राक्ष - 3
तीन मुखी रुद्राक्ष को अनल (अग्न‍ि) के समान बताया गया है |
शिवपुराण के अनुसार तीन मुखी रुद्राक्ष कठिन साधाना के बराबर फल देने वाला बताया गया है। जिन लोगों को विद्या प्राप्ति की अभिलाषा है |
व्यक्ति की हर इच्छा को पूरा करने का सबसे तेज माध्यम है तीन मुखी रुद्राक्ष। इसे पहनने से जल्दी से जल्दी इच्छा पूरी होती है।
इसे पहनते समय ॐ क्लीं नम: का जाप करना चाहिए। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार यथावत पढ़ें।
मंगल इसका अधिपति ग्रह है। मंगल ग्रह निवारण हेतु इसे धारण किया जाता है की प्रतिकूलता के। यह मूंगे से भी अधिक प्रभावशाली है।
मंगल को लाल रक्त कण, गुर्दा, ग्रीवा, जननेन्द्रियों का कारक ग्रह माना गया है।
अतः तीन मुखी रुद्राक्ष को ब्लडप्रेशर, चेचक, बवासीर, रक्ताल्पता, हैजा, मासिक धर्म संबंधित रोगों के निवारण हेतु धारण करना चाहिए।
इसके धारण करने से श्री, तेज एवं आत्मबल मिलता है। यह सेहत व उच्च शिक्षा के लिए शुभ फल देने वाला है।
इसे धारण करने से दरिद्रता दूर होती है तथा पढ़ाई व व्यापार संबंधित प्रतिस्पर्धा में सफलता मिलती है।
अग्नि स्वरूप होने के कारण इसे धारण करने से अग्नि देव प्रसन्न होते हैं, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा शरीर स्वस्थ रहता है।
मेष, सिंह, धनु राशि वाले तथा मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु तथा मीन लग्न के जातकों को इसे अवश्य धारण करना चाहिए।
इसे धारण करने से सर्वपाप नाश होते हैं।

चार मुखी रुद्राक्ष - 4
इस रुद्राक्ष को ब्रह्मा का स्वरूप कहा जाता है।
इसे धारण करने से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे धारण करने का मंत्र है ॐ ह्रीं नम:।
बुध ग्रह की प्रतिकूलता को दूर करने के लिए इसे धारण करना चाहिए। मानसिक रोग, पक्षाघात, पीत ज्वर, दमा तथा नासिका संबंधित रोगों के निदान हेतु इसे धारण करना चाहिए।
चार मुखी रुद्राक्ष धारण करने से वाणी में मधुरता, आरोग्य तथा तेजस्विता की प्राप्ति होती है। इसमें पन्ना रत्न के समान गुण हैं।
सेहत, ज्ञान, बुद्धि तथा खुशियों की प्राप्ति में सहायक है। इसे चारों वेदों का रूप माना गया है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्वर्ग फल देने वाला है।
इसे धारण करने से सांसारिक दुःखों, शारीरिक, मानसिक, दैविक कष्टों तथा ग्रहों के कारण उत्पन्न बाधाओं से छुटकारा मिलता है।
वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर व कुंभ लग्न के जातकों को इसे धारण करना चाहिए। सोमवार को यह मंत्र 108 बार जपकर धारण करें।

पांच मुखी रुद्राक्ष - 5
पंचमुखी रुद्राक्ष को स्वयं रुद्र कालाग्नि‍ के समान बताया गया है. इसे धारण करने से शांत व संतोष की प्राप्त‍ि होती है |
वे लोग जो अपनी हर परेशानी से छुटकारा पाना चाहते हैं उन्हें पांच मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
जिन भक्तों को सभी परेशानियों से मुक्ति चाहिए और मनोवांछित फल प्राप्त करने की इच्छा है, उन्हें पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
इसका मंत्र है ॐ ह्रीं नम:। सोमवार की सुबह मंत्र एक माला जप कर, इसे काले धागे में विधि पूर्वक धारण करना चाहिए।
यह रुद्राक्ष सभी प्रकार के पापों के प्रभाव को भी कम करता है।
बृहस्पति ग्रह की प्रतिकूलता को दूर करने के लिए इसको धारण करना चाहिए।
इसे धारण करने से निर्धनता, दाम्पत्य सुख में कमी, जांघ व कान के रोग, मधुमेह जैसे रोगों का निवारण होता है।
पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करने वालों को सुख, शांति व प्रसिद्धि प्राप्त होते हैं। इसमें पुखराज के समान गुण होते हैं।
यह हृदय रोगियों के लिए उत्तम है। इससे आत्मिक विश्वास, मनोबल तथा ईश्वर के प्रति आसक्ति बढ़ती है।
मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन वाले जातक इसे धारण कर सकते हैं।

छ: मुखी रुद्राक्ष - 6
इस रुद्राक्ष को कार्तिकेय का रूप कहा जाता है। कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं।
वे लोग जो इसे धारण करते हैं उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलती है। इसे धारण करने का मंत्र है ॐ ह्रीं हुम नम:।
इसे धारण करने के पश्चात् प्रतिदिन ॐ ह्रीं हु्रं नमः’ मंत्र का एक माला जप करें।
शुक्र ग्रह की प्रतिकूलता होने पर इसे अवश्य धारण करना चाहिए। नेत्र रोग, गुप्तेन्द्रियों, पुरुषार्थ, काम-वासना संबंधित व्याधियों में यह अनुकूल फल प्रदान करता है।
इसके गुणों की तुलना हीरे से होती है। यह दाईं भुजा में धारण किया जाता है।
इसे प्राण प्रतिष्ठित कर धारण करना चाहिए तथा धारण के समय ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करना चाहिए।
इसे हर राशि के बच्चे, वृद्ध, स्त्री, पुरुष कोई भी धारण कर सकते हैं। गले में इसकी माला पहनना अति उत्तम है।
कार्तिकेय तथा गणेश का स्वरूप होने के कारण इसे धारण करने से ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। इसे धारण करने वाले पर माँ पार्वती की कृपा होती है।

सात मुखी रुद्राक्ष - 7
सात मुखी रुद्राक्ष को अनंग बताया गया है वे लोग जिन्हें अत्याधिक धन की हानि हुई है और उनके पास इससे उबरने का कोई तरीका नहीं है, उन्हें इस रुद्राक्ष को पहनना चाहिए।
इसे धारण करने से पहले ऊँ हुं नम: का जाप करना चाहिए। जो लोग गरीबी से मुक्ति चाहते हैं |
इस रुद्राक्ष को धारण करने से गरीब व्यक्ति धनवान बन सकता है। इसका मंत्र है- ॐ हुं नम:। इस मंत्र के साथ यह रुद्राक्ष धारण करें।
इस रुद्राक्ष के देवता सात माताएं व हनुमानजी हैं। यह शनि ग्रह द्वारा संचालित है।
इसे धारण करने पर शनि जैसे ग्रह की प्रतिकूलता दूर होती है तथा नपुंसकता, वायु, स्नायु दुर्बलता, विकलांगता, हड्डी व मांस पेशियों का दर्द, पक्षाघात, सामाजिक चिंता, क्षय व मिर्गी आदि रोगों में यह लाभकारी है।
इसे धारण करने से कालसर्प योग की शांति में सहायता मिलती है।
यह नीलम से अधिक लाभकारी है तथा किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं देता है। इसे गले व दाईं भुजा में धारण करना चाहिए।
इसे धारण करने वाले की दरिद्रता दूर होती है तथा यह आंतरिक ज्ञान व सम्मान में वृद्धि करता है।
इसे धारण करने वाला प्रगति पथ पर चलता है तथा कीर्तिवान होता है। मकर व कुंभ राशि वाले, इसे धारण कर लाभ ले सकते हैं।

आठ मुखी रुद्राक्ष - 8
शिवपुराण के अनुसार अष्टमुखी रुद्राक्ष भैरव महाराज का रूप माना जाता है।
जो लोग इस रुद्राक्ष को धारण करते हैं, वे अकाल मृत्यु से शरीर का त्याग नहीं करते हैं। ऐसे लोग पूर्ण आयु जीते हैं।
वे लोग जो रोग मुक्त जीवन जीना चाहते हैं उनके लिए आठ मुखी रुद्राक्ष एकदम उपयुक्त है। इस रुद्राक्ष के लिए मंत्र है ॐ हुम नम:।
आठ मुखी रुद्राक्ष में कार्तिकेय, गणेश और गंगा का अधिवास माना जाता है।
राहु ग्रह की प्रतिकूलता होने पर इसे धारण करना चाहिए। मोतियाविंद, फेफड़े के रोग, पैरों में कष्ट, चर्म रोग आदि रोगों तथा राहु की पीड़ा से यह छुटकारा दिलाने में सहायक है।
इसकी तुलना गोमेद से की जाती है। आठ मुखी रुद्राक्ष अष्ट भुजा देवी का स्वरूप है। यह हर प्रकार के विघ्नों को दूर करता है।
इसे धारण करने वाले को अरिष्ट से मुक्ति मिलती है। इसे सिद्ध कर धारण करने से पितृदोष दूर होता है।
मकर और कुंभ राशि वालों के लिए यह अनुकूल है। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ व मीन लग्न वाले इससे जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

नौ मुखी रुद्राक्ष - 9
इस रुद्राक्ष को नौ देवियों का स्वरूप कहा जाता है। यह रुद्राक्ष महाशक्ति के नौ रूपों का प्रतीक है। जो लोग नौमुखी रुद्राक्ष धारण करते हैं, वे सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं।
इन लोगों को समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। समाज में प्रतिष्ठा की चाह रखने वाले लोगों को नौ मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
इसका मंत्र है- ॐ ह्रीं हुं नम:। इस मंत्र के साथ यह रुद्राक्ष धारण करें।
केतु ग्रह की प्रतिकूलता होने पर इसे धारण करना चाहिए। ज्वर, नेत्र, उदर, फोड़े, फुंसी आदि रोगों में इसे धारण करने से अनुकूल लाभ मिलता है।
इसे धारण करने स केतु जनित दोष कम होते हैं। यह लहसुनिया से अधिक प्रभावकारी है। ऐश्वर्य, धन-धान्य, खुशहाली को प्रदान करता है।
धर्म-कर्म, अध्यात्म में रुचि बढ़ाता है। मकर एवं कुंभ राशि वालों को इसे धारण करना चाहिए।

दस मुखी रुद्राक्ष- 10
इसे विष्णु का स्वरूप माना जाता है।दस मुखी रुद्राक्ष में भगवान विष्णु तथा दसमहाविद्या का निवास माना गया है।
हर प्रकार की खुशियों को पाने की चाह रखने वाले लोगों को इस रुद्राक्ष को पहनना चाहिए जिसका मंत्र है ॐ ह्रीं नम:।
जो लोग अपनी सभी इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं, वे दसमुखी रुद्राक्ष पहन सकते हैं।
इसे धारण करने पर प्रत्येक ग्रह की प्रतिकूलता दूर होती है। यह एक शक्तिशाली रुद्राक्ष है तथा इसमें नवरत्न मुद्रिका के समान गुण पाये जाते हैं।
यह सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम है। जादू-टोने के प्रभाव से यह बचाव करता है।
ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करने से पूर्व इसे प्राण-प्रतिष्ठित अवश्य कर लेना चाहिए।
मानसिक शांति, भाग्योदय तथा स्वास्थ्य का यह अनमोल खजाना है। सर्वग्रह इसके प्रभाव से शांत रहते हैं।
मकर तथा कुंभ राशि वाले जातकों को इसे प्राण-प्रतिषिठत कर धारण करना चाहिए।
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष - 11
शिवपुराण के अनुसार ग्यारहमुखी रुद्राक्ष भगवान शिव के अवतार रुद्रदेव का रूप है।
जो व्यक्ति इस रुद्राक्ष को धारण करता है, वह सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करता है। शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को रुद्रदेव का स्वरूप माना जाता है। हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए इसे पहनना चाहिए। इसका मंत्र है ॐ ह्रीं हुम नम:।
जो इसे श‍िखा में धारण करता है, उसे कई हजार यज्ञ कराने का फल मिलता है.
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष भगवान इंद्र का प्रतीक है। यह ग्यारह रुद्रों का प्रतीक है।
इसे शिखा में बांधकर धारण करने से हजार अश्वमेध यज्ञ तथा ग्रहण में दान करने के बराबर फल प्राप्त होता है।
इसे धारण करने से समस्त सुखों में वृद्धि होती है। यह विजय दिलाने वाला तथा आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने वाला है।
दीर्घायु व वैवाहिक जीवन में सुख-शांति प्रदान करता है। विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों तथा विकारों में यह लाभकारी है तथा जिस स्त्री को संतान प्राप्ति नहीं होती है इसे विश्वास पूर्वक धारण करने से बंध्या स्त्री को भी सकती है संतान प्राप्त हो।
इसे धारण करने से बल व तेज में वृद्धि होती है। मकर व कुंभ राशि के व्यक्ति इसे धारण कर जीवन-पर्यंत लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

बारह मुखी रुद्राक्ष - 12
इस रुद्राक्ष को बालों में पहना जाता है। इसे धारण करने का मंत्र है ॐ क्रौं क्षौं रौं नम:।
जो लोग बाहरमुखी रुद्राक्ष धारण करते हैं, उन्हें बारह आदित्यों की विशेष कृपा प्राप्त होती है। बारह मुखी रुद्राक्ष विशेष रूप से बालों में धारण करना चाहिए।
बारह मुखी रुद्राक्ष को विष्णु स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से सर्वपाप नाश होते हैं।
इसे धारण करने से दोनों लोकों का सुख प्राप्त होता है तथा व्यक्ति भाग्यवान होता है। यह नेत्र ज्योति में वृद्धि करता है।
यह बुद्धि तथा स्वास्थ्य प्रदान करता है। यह समृद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान दिलाता है। दरिद्रता का नाश होता है। बढ़ता है मनोबल।
सांसारिक बाधाएं दूर होती हैं तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैेे तथा असीम तेज एवं बल की प्राप्ति होती है।

तेरह मुखी रुद्राक्ष - 13
विश्वदेव के स्वरूप में देखे जाने वाले इस रुद्राक्ष को पहनने वाले लोगों का सौभाग्य चमकने लगता है।
इसे धारण करने से पहले ॐ ह्रीं नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।
इस रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति भाग्यशाली बन सकता है। तेरह मुखी रुद्राक्ष से धन लाभ होता है।
यह समस्त कामनाओं एवं सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। निः संतान को संतान तथा सभी कार्यों में सफलता मिलती है अतुल संपत्ति की प्राप्ति होती है तथा भाग्योदय होता है।
यह समस्त शक्ति तथा ऋद्धि-सिद्धि का दाता है। यह कार्य सिद्धि प्रदायक तथा मंगलदायी है।

चौदह मुखी रुद्राक्ष - 14
इसे स्वयं शिव का स्वरूप कहा जाता है जो समस्त पापों से मुक्ति दिलाता है। इसका मंत्र है ॐ नम:।
इस रुद्राक्ष को भी शिवजी का रूप माना गया है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिल जाती है।
चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य श‍िव के समान पवित्र हो जाता है.
यह भगवान शंकर का सबसे प्रिय रुद्राक्ष है। यह हनुमान जी का स्वरूप है। धारण करने वाले को परमपद प्राप्त होता है।
इसे धारण करने से शनि व मंगल दोष की शांति होती है। दैविक औषधि के रूप में यह शक्ति बनकर शरीर को स्वस्थ रखता है।
सिंह राशि वाले इसको धारण करें, तो उत्तम रहेगा।
रुद्राक्ष एक अमूल्य मोती है जिसे धारण करके या जिसका उपयोग करके व्यक्ति अमोघ फलों को प्राप्त करता है.
भगवान शिव का स्वरूप रुद्राक्ष जीवन को सार्थक कर देता है इसे अपनाकर सभी कल्याणमय जीवन को प्राप्त करते हैं.रुद्राक्ष की अनेक प्रजातियां तथा विभिन्न प्रकार उपल्बध हैं, परंतु रुद्राक्ष की सही पहचान कर पाना एक कठिन कार्य है.
आजकल बाजार में सभी असली रुद्राक्ष को उपल्बध कराने की बात कहते हैं किंतु इस कथन में कितनी सच्चाई है इस बात का अंदाजा लगा पाना एक मुश्किल काम है.
लालची लोग रुद्राक्ष पर अनेक धारियां बनाकर उन्हें बारह मुखी या इक्कीस मुखी रुद्राक्ष कहकर बेच देते हैं.
कभी-कभी दो रुद्राक्ष को जोड़कर एक रुद्राक्ष जैसे गौरी शंकर या त्रिजुटी रुद्राक्ष तैयार कर दिए जाता हैं.
इसके अतिरिक्त उन्हें भारी करने के लिए उसमें सीसा या पारा भी डाल दिया जाता है, तथा कुछ रुद्राक्षों में हम सर्प, त्रिशुल जैसी आकृतियां भी बना दी जाती हैं.
रुद्राक्ष की पहचान को लेकर अनेक भ्रातियां भी मौजूद हैं. जिनके कारण आम व्यक्ति असल रुद्राक्ष की पहचान उचित प्रकार से नहीं कर पाता है एवं स्वयं को असाध्य पाता है.
असली रुद्राक्ष का ज्ञान न हो पाना तथा पूजा ध्यान में असली रुद्राक्ष न होना पूजा व उसके प्रभाव को निष्फल करता है. अत: ज़रूरी है कि पूजन के लिए रुद्राक्ष का असली होना चाहिए.
रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा हो दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं.
भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते.
असली रुद्राक्ष की पहचान के कुछ तरीके बताए जाते हैं जो इस प्रकार हैं.
रुद्राक्ष की पहचान के लिए रुद्राक्ष को कुछ घंटे के लिए पानी में उबालें यदि रुद्राक्ष का रंग न निकले या उस पर किसी प्रकार का कोई असर न हो, तो वह असली होगा.
रुद्राक्ष को काटने पर यदि उसके भीतर उतने ही घेर दिखाई दें जितने की बाहर हैं तो यह असली रुद्राक्ष होगा |
यह परीक्षण सही माना जाता है,किंतु इसका नकारात्मक पहलू यह है कि रुद्राक्ष नष्ट हो जाता है.
रुद्राक्ष की पहचान के लिए उसे किसी नुकिली वस्तु द्वारा कुरेदें यदि उसमे से रेशा निकले तो समझें की रुद्राक्ष असली है.
दो असली रुद्राक्षों की उपरी सतह यानि के पठार समान नहीं होती किंतु नकली रुद्राक्ष के पठार समान होते हैं.
एक अन्य उपयोग द्वारा रुद्राक्ष के मनके को तांबे के दो सिक्कों के बीच में रखा जाए, तो थोड़ा सा हिल जाता है
क्योंकि रुद्राक्ष में चुंबकत्व होता है जिस की वजह से ऐसा होता है.
एकमुखी रुद्राक्ष को ध्यानपूर्वक देखने पर उस पर त्रिशूल या नेत्र के चिन्ह का आभास होता है.
रुद्राक्ष के दानों को तेज धूप में काफी समय तक रखने से अगर रुद्राक्ष पर दरार न आए या वह टूटे नहीं तो असली माने जाते हैं.
रुद्राक्ष को खरीदने से पहले कुछ मूलभूत बातों का अवश्य ध्यान रखें जैसे की रुद्राक्ष में किडा़ न लगा हो, टूटा-फूटा न हो, पूर्ण गोल न हो, जो रुद्राक्ष छिद्र करते हुए फट जाए इत्यादि रुद्राक्षों को धारण नहीं करना चाहिए .
अगर आप अपने जीवन को शुद्ध करना चाहते हैं तो रुद्राक्ष उसमें मददगार हो सकता है।
जब कोई इंसान अध्यात्म के मार्ग पर चलता है, तो अपने लक्ष्य को पाने के लिए वह हर संभव उपाय अपनाने को आतुर रहता है।
ऐसे में रुद्राक्ष निश्चित तौर पर एक बेहद मददगार जरिया साबित हो सकता है।
रुद्राक्ष धारण करने की सम्पूर्ण विधि
यदि किसी कारण वश रुद्राक्ष के विशेष रुद्राक्ष मंत्रों से धारण न कर सके तो इस सरल विधि का प्रयोग करके धारणकर लें।
रुद्राक्ष के मनकों को शुद्ध लाल धागे में माला तैयार करने के बाद पंचामृत ( गंगा जल मिश्रित रूप से) और पंचगव्य को मिलाकर स्नान करवाना चाहिए और प्रतिष्ठा के समय ॐ नमः शिवाय इस पंचाक्षर मंत्र को पढ़ना चाहिए।
उसके पश्चात पुनः गंगा जल में शुद्ध करके निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए चंदन, बिल्वपत्र, लालपुष्प, धूप, दीप द्वारा पूजन करके अभिमंत्रित करे और ॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात।
108 बार मंत्र का जाप कर अभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए।

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