31/01/2026
क्या 'सोनार' अब बनेंगे 'सब्जी-फल विक्रेता'? 2026 में गहराया छोटे स्वर्णकारों की विरासत पर संकट
"बोर्ड पर लिखा है 'ज्वेलर्स', लेकिन नीचे चमक रहे हैं सेब और संत्रे। यह कोई भूल नहीं, बल्कि 2026 की वो कड़वी हकीकत है जिसे 'प्लान B' का नाम दिया जा रहा है।"
सोने और चांदी की कीमतें जिस रफ़्तार से रॉकेट बनी हैं, उसने न केवल आम आदमी की पहुँच से गहनों को दूर कर दिया है, बल्कि उन छोटे स्वर्णकारों (Traditional Goldsmiths) की कमर तोड़ दी है जो पीढ़ियों से इस धंधे में थे। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही 'सागर ज्वैलर्स' और 'श्री राधे कृष्णा ज्वैलर्स' की तस्वीरें इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि महंगाई ने कैसे एक कलाकार को व्यापारी से भी नीचे लाकर खड़ा कर दिया है।
ज्वैलरी शॉप या फलों की दुकान?
वायरल हो रही तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि एक चमचमाते शोरूम के बाहर, जहाँ कभी ग्राहकों की भीड़ गहने देखने के लिए लगती थी, अब वहाँ फलों के क्रेट रखे हैं। 'सागर ज्वैलर्स' के काउंटर पर सोने की अंगूठियों की जगह अब ताजे फल सजे हैं। इसे सोशल मीडिया पर लोग व्यंग्य में "प्लान B एक्टिवेटेड इन 2026" कह रहे हैं, लेकिन यह व्यंग्य नहीं, एक समाज की आर्थिक त्रासदी है।
विरासत (Virasat) पर सबसे बड़ा हमला
सवाल यह है कि क्या यह बढ़ते रेट छोटे स्वर्णकार से उसकी पहचान छीन लेंगे? जवाब डराने वाला है।
कला का अंत: स्वर्णकारी (Goldsmithing) केवल व्यापार नहीं, एक कला है जो बाप-दादा से अगली पीढ़ी को मिलती थी। जब दुकान में ग्राहक ही नहीं चढ़ेगा, तो वह कारीगर अपनी छेनी-हथौड़ी छोड़कर तराजू-बाट उठाने को मजबूर हो जाएगा। जैसा कि इन तस्वीरों में दिख रहा है, पीढ़ियों का हुनर अब पेट पालने की मजबूरी के आगे घुटने टेक रहा है।
पूंजी का अभाव: सोने का भाव बढ़ने का मतलब है कि दूकान में माल भरने के लिए अब 4 गुना अधिक पूंजी चाहिए। छोटा सुनार इतनी पूंजी कहाँ से लाएगा? नतीजा—दुकान का शटर या तो हमेशा के लिए गिर रहा है, या फिर वहां किराना और फल बेचे जा रहे हैं।
विश्वास और रिश्ते का खात्मा: छोटे शहरों में सुनार केवल दुकानदार नहीं, परिवार का हिस्सा होता था। सुख-दुस में लोग जेवर गिरवी रखने या बनवाने उसी के पास जाते थे। अब कॉर्पोरेट शोरूम और ऑनलाइन मार्केट ने उस 'पर्सनल टच' को खत्म कर दिया है, और बची-कुची कसर महंगाई ने पूरी कर दी।
कारीगर का दर्द
एक पुराने स्वर्णकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "साहब, मेरे दादा जी ने इसी दुकान में राजा-महाराजाओं के लिए जेवर बनाए थे। आज हालत यह है कि मैं अपने बेटे को यह काम नहीं सिखाना चाहता। जिस दुकान में लक्ष्मी जी की मूरत थी, वहां अब केले बेचकर गुजारा करना पड़ रहा है। डर है कि आने वाले वक्त में 'सुनार' शब्द केवल इतिहास की किताबों में रह जाएगा।"
निष्कर्ष
ये तस्वीरें एक चेतावनी हैं। अगर यही हाल रहा, तो हम न केवल छोटे व्यापारियों को खो देंगे, बल्कि भारत की उस समृद्ध 'स्वर्ण-कला' को भी खो देंगे जो हमारी संस्कृति की पहचान थी। सोने की चमक तो बरकरार है, लेकिन उसे गढ़ने वाले हाथों की लकीरें मिटती जा रही हैं।