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🌹27 नक्षत्र मंत्र ।। वैदिक , पौराणिक और नक्षत्र देवता मंत्र ।🌹हमारे जीवन में नक्षत्रों का भी उतना ही महत्त्व है जितना की...
28/05/2026

🌹27 नक्षत्र मंत्र ।। वैदिक , पौराणिक और नक्षत्र देवता मंत्र ।🌹

हमारे जीवन में नक्षत्रों का भी उतना ही महत्त्व है जितना की नवग्रहों का, ऋषि मुनियों ने नभ मंडल को २७ नक्षत्र में बांटा हैं और प्रतीक राशि के अंतर्गत ३ नक्षत्र आते हैं।
पीड़ा परेशानी होने पर हम ग्रहों की पूजा, दान और जप तो करते हैं पर नक्षत्रों को भूल जाते हैं। यहाँ आपको नक्षत्रों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवा रहा हूँ जिसमे उनके वैदिक, पौराणिक मंत्र, नक्षत्र देवता के मंत्र और नक्षत्र मंत्र हैं। अपने नक्षत्र मंत्र के जप करके आप लाभ उठा सकते है उसे बलवान कर सकते हैं साथ ही नक्षत्र की वनस्पति के वृक्ष को लगाकर उसकी सेवा करके यानि नित्य जल देते हुए मंत्र जप कर लाभ ले सकते हैं और यदि किसी कारण से नक्षत्र लाभ न दे रहा हो तो उसे अपने पक्ष में लाभ देने वाला बना सकते हैं। आपका जन्म नक्षत्र कैसा है और आपके जीवन पर क्या प्रभाव दे रहा है इसके लिए किसी विद्वान पंडित जी या ज्योतिषी से सम्पर्क कर इस जानकारी का लाभ ले सकते हैं।
1। अश्विनी
नक्षत्र: अश्विनी
नक्षत्र देवता : अश्विनीकुमार
नक्षत्र स्वामी : केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कुचला
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: घोडा
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव : शुभ
वेद मंत्र
ॐ अश्विनौ तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वती वीर्य्यम वाचेन्द्रो
बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ।
पौराणिक मंत्र:
अश्विनी देवते श्वेतवर्णो तौव्दिभुजौ स्तुमः
lसुधासंपुर्ण कलश कराब्जावश्च वाहनौ ll
नक्षत्र देवता मंत्र:
अ)ॐअश्विनी कुमाराभ्यां नमः
आ) ॐ अश्विभ्यां नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अश्वयुगभ्यां नमःl
2। भरणी
नक्षत्र : भरणी
नक्षत्र देवता : यम - आद्य पितर
नक्षत्र स्वामी :शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : आँवला
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : हत्ती
नक्षत्र तत्व : अग्नी
नक्षत्र स्वभाव : क्रूर
वेद मंत्र
ॐ यमायत्वा मखायत्वा सूर्य्यस्यत्वा तपसे देवस्यत्वा सवितामध्वा
नक्तु पृथ्विया स गवं स्पृशस्पाहिअर्चिरसि शोचिरसि तपोसी।
पौराणिक मंत्र:
पाशदण्डं भुजव्दयं यमं महिष वाहनम l
यमं नीलं भजे भीमं सुवर्ण प्रतीमागतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ यमाय् नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अपभरणीभ्यो नमःl
3 । कृतिका
नक्षत्र: कृतिका
नक्षत्र देवता : अग्नी
नक्षत्र स्वामी : रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : उंबर, औदुंबर
राशी व्याप्ती : १ले चरण मेष राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण वृषभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: बकरी
नक्षत्र तत्व :अग्नी
नक्षत्र स्वभाव : क्रूर
वेद मंत्र
ॐ अयमग्नि सहत्रिणो वाजस्य शांति गवं
वनस्पति: मूर्द्धा कबोरीणाम । ॐ अग्नये नम: ।
पौराणिक मंत्र:
कृतिका देवतामाग्निं मेशवाहनं संस्थितम् l
स्त्रुक् स्तुवाभीतिवरधृक्सप्तहस्तं नमाम्यहम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ आग्नेय नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र :ॐ कृतिकाभ्यो नमः
4 । रोहिणी
नक्षत्र: रोहिणी
नक्षत्र देवता :ब्रम्हा
नक्षत्र स्वामी : चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :जामुन जांभळी, जांभू
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृषभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: सर्प
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
वेद मंत्र
ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचोवेन आव: सबुधन्या उपमा
अस्यविष्टा: स्तश्चयोनिम मतश्चविवाह ( सतश्चयोनिमस्तश्चविध: )
पौराणिक मंत्र:
प्रजापतीश्वतुर्बाहुः कमंडल्वक्षसूत्रधृत् l
वराभयकरः शुध्दौ रोहिणी देवतास्तु मे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:-
अ) ॐ ब्रम्हणे नमःl
आ) ॐ प्रजापतये नमःll
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रौहिण्यै नमःl
5 । मृगशिरा
नक्षत्र: मृगशिरा
नक्षत्र देवता: चंद्र
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : खैर (कात)
राशी व्याप्ती : २ चरण वृषभ राशीमध्ये,
बाकीचे २ चरण मिथुन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :सर्प
नक्षत्र तत्व: वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
वेद मंत्र
ॐ सोमधेनु गवं सोमाअवन्तुमाशु गवं सोमोवीर: कर्मणयन्ददाति
यदत्यविदध्य गवं सभेयम्पितृ श्रवणयोम । ॐ चन्द्रमसे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
श्वेतवर्णाकृतीः सोमो व्दिभुजो वरदण्डभृत् lदशाश्वरथमारूढो मृगशिर्षोस्तु मे मुदे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
अ) ॐ चंद्रमसे नमःl
आ) ॐ सोमाय नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ मृगशीर्षाय नमःl
6 ।आर्द्रा
नक्षत्र: आर्द्रा
नक्षत्र देवता : रुद्र (शिव)
नक्षत्र स्वामी : राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कृष्णागरू,काला तेंदू
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मिथुन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : कुत्रा
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव : तीक्ष्ण
वेद मंत्र
ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यां मुतते नम: ।
ॐ रुद्राय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
रुद्र श्वेतो वृशारूढः श्वेतमाल्यश्चतुर्भुजःl
शूलखड्गाभयवरान्दधानो मे प्रसीदतु ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ रुद्राय नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl
7 पुनर्वसु
नक्षत्र: पुनर्वसु
नक्षत्र देवता: अदिती
नक्षत्र स्वामी: गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :बांस / बांबू
राशी व्याप्ती: 3 चरणे मिथुन राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: मांजर
नक्षत्र तत्व: वायु
नक्षत्र स्वभाव: चर
वेद मंत्र
ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदिति र्माता: स पिता स पुत्र:
विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातम अदितिर्रजनित्वम ।
ॐ आदित्याय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
अदितीः पीतवर्णाश्च स्त्रुवाक्षकमण्डलून l
दधाना शुभदा मे स्यात पुनर्वसु कृतारव्या ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
अ) ॐ आदित्यै नमःl
आ)ॐ आदितये नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl
8 ) पुष्य
नक्षत्र: पुष्य
नक्षत्र देवता: गुरु
नक्षत्र स्वामी: शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: पिंपळ, पीपल
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :बकरी
नक्षत्र तत्व :अग्नी
नक्षत्र स्वभाव:शुभ
वेद मंत्र
ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद दुमद्विभाति क्रतमज्जनेषु ।
यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविण धेहि चित्रम ।
ॐ बृहस्पतये नम:
पौराणिक मंत्र:
वंदे बृहस्पतिं पुष्यदेवता मानुशाकृतिम् l
सर्वाभरण संपन्नं देवमंत्रेण मादरात् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ बृहस्पतये नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुष्याय नमःl
9 ) आश्लेषा
नक्षत्र:आश्लेषा
नक्षत्र देवता: सर्प
नक्षत्र स्वामी : बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: नागकेसर
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : मांजर
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण,शोक
वेद मंत्र
ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:।
ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: ।
ॐ सर्पेभ्यो नम:।
पौराणिक मंत्र:
सर्पोरक्त स्त्रिनेत्रश्च फलकासिकरद्वयःl
आश्लेषा देवता पितांबरधृग्वरदो स्तुमे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ सर्पेभ्यो नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आश्लेषायै नमःl
10 ) मघा
नक्षत्र: मघा
नक्षत्र देवता: पितर
नक्षत्र स्वामी: केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: बरगद
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: उंदीर
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव :क्रुर, उग्र
वेद मंत्र
ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वाधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: ।
प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त:
पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।
पौराणिक मंत्र :
पितरः पिण्डह्स्ताश्च कृशाधूम्रा पवित्रिणःl
कुशलं द्घुरस्माकं मघा नक्षत्र देवताःll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पितृभ्यो नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मघायै नमः
11 )पुर्वा (फाल्गुनी)
नक्षत्र: पुर्वा (फाल्गुनी)
नक्षत्र देवता : भग
नक्षत्र स्वामी : शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : पलाश (पळस)
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी:उंदीर
नक्षत्र तत्व: क्रुर
नक्षत्र स्वभाव : शुभ
वेद मंत्र
ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: ।
भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: ।
ॐ भगाय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
भगं रथवरारुढं व्दिभुंज शंखचक्रकम् l
फाल्गुनीदेवतां ध्यायेत् भक्ताभीष्टवरप्रदाम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ भगाय नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्व फाल्गुनीभ्यां नमःl
12 ) उत्तरा (फाल्गुनी)
नक्षत्र:उत्तरा (फाल्गुनी)
नक्षत्र देवता : अर्यमा
नक्षत्र स्वामी: रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष पाकड़
राशी व्याप्ती १ ले चरण सिंह राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण कन्या राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: गाय
नक्षत्र तत्व :वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
वेद मंत्र
ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत गवं रथेन सूर्य्यतव्चा ।
मध्वायज्ञ गवं समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम ।
ॐ अर्यमणे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
संपूजयाम्यर्यमणं फाल्गुनी तार देवताम् l
धुम्रवर्णं रथारुढं सुशक्तिकरसंयुतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ अर्यम्ने नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरा फाल्गुनीभ्यां नमःl
13) हस्त
नक्षत्र :हस्त
नक्षत्र देवता : सुर्य
नक्षत्र स्वामी : चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : ,चमेली रीठा
राशी व्याप्ती :४ हि चरण कन्या राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : म्हैस
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: शुभ, सत्वगुणी
वेद मंत्र
ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम
वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति ।
ॐ सावित्रे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
सवितारहं वंदे सप्ताश्चरथ वाहनम् l
पद्मासनस्थं छायेशं हस्तनक्षत्रदेवताम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ सवित्रे नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ हस्ताय नमः
14 ) चित्रा
नक्षत्र : चित्रा
नक्षत्र देवता: त्वष्टा
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: बेल
राशी व्याप्ती : २ चरण कन्या राशीमध्ये,
बाकीचे, २ चरण तुळ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: वाघ
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
वेद मंत्र
ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम ।
द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: ।
त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
त्वष्टारं रथमारूढं चित्रानक्षत्रदेवताम् l
शंखचक्रान्वितकरं किरीटीनमहं भजे ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ त्वष्ट्रे नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ चित्रायै नमःl
15 ) स्वाती
नक्षत्र :स्वाती
नक्षत्र देवता: वायु
नक्षत्र स्वामी : राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: अर्जुन
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण तुळ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: म्हैस
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
वेद मंत्र
ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो
युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर:
स्वपत्थ्या निचक्रु: । ॐ वायव नम: ।
पौराणिक मंत्र:
वायुवरं मृगारुढं स्वाती नक्षत्र देवताम् l
खड्.ग चर्मोज्वल करं धुम्रवर्ण नमाम्यह्म् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वायवे नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ स्वात्यै नमःl
16) विशाखा
नक्षत्रः विशाखा
नक्षत्र देवता : इंद्राग्नी
नक्षत्र स्वामी : गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: कटाई, नागकेशर
राशी व्याप्ती : पहिले 3 चरण तुळ राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : वाघ
नक्षत्र तत्व : वायु
नक्षत्र स्वभाव: अशुभ
वेद मंत्र
ॐ इन्द्रान्गी आगत गवं सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम ।
अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: ।
पौराणिक मंत्र:
इंद्राग्नीशुभदौ स्यातां विशाखा देवतेशुभे l
नमोम्ये करथारुढौ वराभयकरांबुजौ l
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राग्नीभ्यां नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ विशाखाभ्यां नमःl
17) अनुराधा
नक्षत्र :अनुराधा
नक्षत्र देवता : मित्र
नक्षत्र स्वामी : शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :मौलश्री
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: हरीण
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: शुभ
वेद मंत्र
ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत
गवं सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश
गवं सत । ॐ मित्राय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
मित्रं पद्मासनारूढं अनुराधेश्वरं भजे l
शूलां कुशलसद्भाहुं युग्मंशोणितवर्णकम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ मित्राय नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अनुराधाभ्यो नमःl
18) जेष्ठा
नक्षत्र: जेष्ठा
नक्षत्र देवता: इंद्र
नक्षत्र स्वामी :बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: निर्गुडी/चीड़
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: हरीण
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
वेद मंत्र
ॐ त्राताभिंद्रमबितारमिंद्र गवं हवेसुहव गवं शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं
पुरुहूतभिंद्र गवं स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: । ॐ इन्द्राय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
श्वेतहस्तिनमारूढं वज्रांकुशलरत्करम् l
सहस्त्रनेत्रं पीताभं इंद्रं ह्रदि विभावये ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राय नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ जेष्ठायै नमःl
19) मूळ
नक्षत्र:मूळ
नक्षत्र देवता: निॠति (राक्षस)
नक्षत्र स्वामी: केतु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष : साल
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: कुत्रा
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण
वेद मंत्र
ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि गवं स्वयोनावभारुषा तां
विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त ।
ॐ निॠतये नम: ।
पौराणिक मंत्र: खड्.गखेटधरं कृष्णं यातुधानं नृवाहनम् l
अर्ध्वकेशं विरुपाक्षं भजे मुलाधिदेवताम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ निॠतये नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मुलाय नमःl
20 ) पूर्वाषाढा
नक्षत्र: पूर्वाषाढा
नक्षत्र देवता: जल/ उदक
नक्षत्र स्वामी: शुक्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: वेत
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी:वानर
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: उग्र
वेद मंत्र
ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद
यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।
पौराणिक मंत्र:
आषाढदेवता नित्यमापः सन्तु शुभावहाःl
समुद्र गास्तरा गिणोल्हादिन्यःसर्वदेहिनाम्ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अद्भयो नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पूर्वाषाढाभ्यां नमःl
21 ) उत्तराषाढा
नक्षत्र: उत्तराषाढा
नक्षत्र देवता: विश्वदेव
नक्षत्र स्वामी: रवि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :फणस, कटहल
राशी व्याप्ती : पहिले चरण धनु राशीमध्ये,
बाकीचे ३ चरण मकर राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: मुंगुस
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: स्थिर
वेद मंत्र
ॐ विश्वे अद्य मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा:
विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।
पौराणिक मंत्र:
विश्वांदेवान् अहं वंदेषाढनक्षत्रदेवताम् l
श्रीपुष्टिकीर्तीधीदात्री सर्वपापानुमुक्तये ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तराषाढाभ्यां नमःl
22 ) श्रवण
नक्षत्र: श्रवण
नक्षत्र देवता: विष्णु
नक्षत्र स्वामी: चंद्र
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: रुई ( अर्क ) मंदार
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मकर राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: वानर
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: चर
वेद मंत्र
ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो
धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा । ॐ विष्णवे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
शांताकारं चतुर्हस्तं श्रोणा नक्षत्रवल्लभम् l
विष्णु कमलपत्राक्षं ध्यायेद् गरुड वाहन् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विष्णवे नमः l
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ श्रवणाय नमःl
23) धनिष्ठा
नक्षत्र: धनिष्ठा
नक्षत्र देवता :वसु
नक्षत्र स्वामी: मंगळ
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: शमी
राशी व्याप्ती: पहिले २ चरण मकर राशीमध्ये,
बाकीचे २ चरण कुंभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: सिंह
नक्षत्र तत्व: पृथ्वी
नक्षत्र स्वभाव: थोडेसे शुभ
वेद मंत्र
ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम ।
देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: ।
ॐ वसुभ्यो नम: ।
पौराणिक मंत्र
श्राविष्ठादेवतां वंदे वसुन्वरधराश्रिताम् l
शंखचक्रांकितरांकिरीटांकित मस्तकाम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वसुभ्यो नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ धनिष्ठायै नमःl
24 ) शतभिषा
नक्षत्र: शतभिषा
नक्षत्र देवता: वरुण
नक्षत्र स्वामी: राहु
नक्षत्र आराध्य वृक्ष :कदंब
राशी व्याप्ती : ४ हि चरण कुंभ राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: घोडा
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: चर
वेद मंत्र
ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य
ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि ।
ॐ वरुणाय नम: ।
पौराणिक मंत्र:
वरुणं सततं वंदे सुधाकलश धारीणम् l
पाशहस्तं शतभिशग् देवतां देववंदीतम ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वरुणाय नमः
नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ शतभिषजे नमः
25 ) पुर्वाभाद्रपदा
नक्षत्र: पुर्वाभाद्रपदा
नक्षत्र देवता: अजैक चरण
नक्षत्र स्वामी: गुरू
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: आंबा, आम
राशी व्याप्ती : पहिले ३ चरण कुंभ राशीमध्ये,
बाकीचे १ चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी :सिंह
नक्षत्र तत्व: अग्नी
नक्षत्र स्वभाव: उग्र
वेद मंत्र
ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा
ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु ।
ॐ अजैकपदे नम:।
पौराणिक मंत्र:
शिरसा महजं वंदे ध्येकपादं तमोपहम् l
मुदे प्रोष्ठपदेवानं सर्वदेवनमस्कृतम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र :-
ॐ अजैकपदे नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्वाप्रोष्ठपद्भ्यां नमःl
26 ) उत्तराभाद्रपदा
नक्षत्र : उत्तराभाद्रपदा
नक्षत्र देवता : अहिर्बुंधन्य
नक्षत्र स्वामी: शनि
नक्षत्र आराध्य वृक्ष:नीम
राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी: गायक
नक्षत्र तत्व : जल
नक्षत्र स्वभाव : ध्रुव
वेद मंत्र
ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि गवं सो
निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय ( सुप्रजास्वाय ) ।
पौराणिक मंत्र:
अहिर्मे बुध्नियो भूयात मुदे प्रोष्ठ पदेश्वरःl
शंखचक्रांकीतकरः किरीटोज्वलमौलिमान् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अहिर्बुंधन्याय नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरप्रोष्ठपदभ्यां नमःl
27 ) रेवती
नक्षत्र : रेवती
नक्षत्र देवता :पूषा
नक्षत्र स्वामी :बुध
नक्षत्र आराध्य वृक्ष: महुआ
राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये
नक्षत्र प्राणी : हत्ती
नक्षत्र तत्व: जल
नक्षत्र स्वभाव: मृदु
वेद मंत्र
ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन ।
स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम: ।
पौराणिक मंत्र:
पूषणं सततं वंदे रेवतीशं समृध्दये l
वराभयोज्वलकरं रत्नसिंहासने स्थितम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पूष्णे नमःl
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रेवत्यै नमःl

🌹श्री महाकाली एकाक्षरी मन्त्र साधना🌹मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में से मां काली भी एक स्वरूप है। महाकाली के रूप को दे...
28/05/2026

🌹श्री महाकाली एकाक्षरी मन्त्र साधना🌹

मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में से मां काली भी एक स्वरूप है। महाकाली के रूप को देवी के सभी रूपों में से सबसे शक्तिशाली माना जाता है। काली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘काल’ शब्द से हुई है। हिन्दू शास्त्रों में मां काली को अभिमानी राक्षसों के संहार के लिए जाना जाता है। आमतौर पर मां काली की साधना सन्यासी और तांत्रिक करते हैं। यह भी मान्यता है कि मां काली काल का संहार कर मोक्ष प्रदान करती हैं। वह अपने उपासक हर इच्छा पूरी करती हैं। मां काली के कुछ ऐसे मंत्र हैं जिनका जप कोई भी व्यक्ति रोजमर्रा के जीवन में संकट दूर करने के लिए कर सकता है। इस लेख में आगे हम आपको मां काली, उनके मंत्र और जप से होने वाले फायदों के बारे में विस्तार से बताएंगे।

महाकाली की पूजा के लाभ
काली शब्द काले रंग का प्रतीक है। साधक काली की उपासना को सबसे प्रभावशाली मानते हैं। काली किसी भी काम का तुरंत परिणाम देती हैं। काली की साधना के बहुत से लाभ होते हैं। जो साधक को साधना पूरी करने के बाद ही पता चल पाते हैं। यदि मां काली आपकी उपासना से प्रसन्न हो जाती हैं तो उनके आशीर्वाद से आपका जीवन बेहद सुखद हो जाता है।

एकाक्षर मंत्र : क्रीं
मां काली का एकाक्षरी मंत्र ‘क्रीं है। इसका जप मां के सभी रूपों की आराधना, उपासना और साधना में किया जा सकता है। वैसे इसे चिंतामणि काली का विशेष मंत्र भी कहा जाता है।

द्विअक्षर मंत्र : क्रीं क्रीं
इस मंत्र का भी स्वतंत्र रूप से जप किया जाता है। तांत्रिक साधनाएं और मंत्र सिद्धि हेतु हेतु बड़ी संख्या में किसी भी मंत्र का जप करने के पहले और बाद में सात-सात बार इन दोनों बीजाक्षरों के जप का विशिष्ट विधान है।

त्रिअक्षरी मंत्र : क्रीं क्रीं क्रीं
त्रिअक्षरी मंत्र ‘क्रीं क्रीं क्रीं’ काली की साधनाओं और उनके प्रचंड रूपों की आराधनाओं का विशिष्ट मंत्र है। द्विअक्षर मंत्र की तरह इसे भी तांत्रिक साधना मंत्र के पहले और बाद में किया जा सकता है।

ज्ञान प्रदाता मन्त्र : ह्रीं
यह भी एकाक्षर मंत्र है। काली की के बाद इस मंत्र के नियमित जप से साधक को सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसे विशेष रूप से दक्षिण काली का मंत्र कहा जाता है।

क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा
पांच अक्षर के इस मंत्र के प्रणेता स्वयं जगतपिता ब्रह्मा जी हैं। इस मंत्र का प्रतिदिन सुबह के समय 108 बार जप करने से सभी दुखों का निवारण करके घन-धान्य की वृद्धि होती है। इसके जप से पारिवारिक शांति भी बनी रहती है।

क्रीं क्रीं फट स्वाहा
छह अक्षरों का यह मंत्र तीनों लोकों को मोहित करने वाला है। सम्मोहन आदि तांत्रिक सिद्धियों के लिए इस मंत्र का विशेष रूप से जप किया जाता है।

क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चारों ध्येयों की आपूर्ति करने में यह मंत्र समर्थ है। आठ अक्षरों से निर्मित इस मंत्र उपासना को उपासना के अंत में जप करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

नवार्ण मंत्र
‘ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै:’ दुर्गासप्तशती के अनुसार नौ अक्षरों से बना यह मंत्र मां के नौ स्वरूपों को समर्पित है। इसका प्रत्येक अक्षर एक ग्रह को नियंत्रित करता है। इस मंत्र का जप नवरात्रों में विशेष फलदायी होता है।

उपासना विधि
मां काली की उपासना के लिए मां की तस्वीर या प्रतिमा को स्वच्छ आसान पर स्थापित करें। प्रतिमा के तिलक लगाएं और पुष्प आदि अर्पित करें। एक आसन पर बैठकर प्रतिदिन किसी भी मंत्र का 108 बार जप करें। जप के बाद अपनी सामथ्र्य के अनुसार भोग मां काली को अर्पण करें। अपनी इच्छा पूरी होने तक इस प्रयोग को जारी रखें। यदि आप विशेष उपासना करना चाहते हैं तो सवा लाख, ढाई लाख, पांच लाख मंत्र का जप अपनी सुविधा अनुसार कर सकते हैं।

(1) आचमन, पवित्रीकरण, आसन शुद्धि करे। जिसका गुरु हो वो गुरु पूजन करे। जिसका गुरु नहीं हो वह अपने सामने रखे शिवलिंग या शिव मूर्ति/चित्र को श्रीदक्षिणामूर्ति शिवजी जानकर और अपना गुरु मानकर पूजा करे।

श्री दक्षिणामूर्ति गुरू ध्यान
मौन व्याख्या प्रकटित परब्रह्म-तत्त्वं युवानं, वर्षिष्ठान्ते-वसदृषि-गणै-रावृतं ब्रह्मनिष्ठैः । आचार्येन्द्रं करकलित चिन्मुद्रमानन्दरूपं स्वात्मारामं मुदितवदनं श्रीदक्षिणामूर्ति-मीडे ॥

(ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों से घिरे युवा गुरु मौन रह कर ब्रह्म ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। अपने हाथ की ज्ञान मुद्रा द्वारा उपदेश करते हुए ऐसे आनन्दरूप गुरुओं के गुरु दक्षिणामूर्ति जी को मैं प्रणाम करता हूं।)

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अब गुरु पूजा करे ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं लं पृथ्वी तत्त्वात्मकं गन्धं अनुकल्पयामि । चन्दन चढा दे ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं हं आकाश तत्त्वात्मकं पुष्पं अनुकल्पयामि। फूल चढा दे ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे, ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं रं वह्नयात्मकं दीपं अनुकल्पयामि । दीप दिखा दे ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं वं अमृत-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं अनुकल्पयामि। नैवेद्य चढा दे ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः ॥ क्रीं सं सर्व-तत्त्वात्मकं सर्वोपचारं मनसा परिकल्प्य समर्पयामि। फूल चढा दे
नमस्कार करके गुरु से श्रीकालिका जप-पूजन की आज्ञा देने की प्रार्थना करें

अनेकजन्म-संप्राप्त कर्मबन्ध विदाहिने। आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ स्मित-धवल – विकसिताननाब्जं श्रुति-सुलभं वृषभाधिरूढ-गात्रम्।

सितजलज-सुशोभित देहकान्तिं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे, त्रिभुवन-गुरुमागमैक-प्रमाणं त्रिजगत्कारण-सूत्रयोग मायम्। रविशत-भास्वरमीहित प्रधानं सततमहं -दक्षिणामूर्तिमीडे ।

अखण्ड-मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः, निरवधि- सुखमिष्ट-दातारमीड्यं नतजन-मनस्ताप भेदैक-दक्षम् ।

भव-विपिन-दवाग्नि-नामधेयं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ।

ज्ञानशक्ति-समारूढ़ः तत्त्वमाला- विभूषितः भुक्तिमुक्ति प्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्रीगुरो दक्षिणामूर्ते भक्तानुग्रह- -कारक। अनुज्ञां देहि भगवन् श्रीकालिका जपार्चनस्य मे ॥

अब गुरु मन्त्र 11 बार जपे : ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ
(2) गणेशजी की मूर्ति/चित्र पर फूल चढाकर ध्यान करे
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय, लम्बोदराय सकलाय जगत् हिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञभूषिताय, गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रियं । निर्विघ्न कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

ॐ श्री गणेशाय नमः लं पृथ्वी तत्त्वात्मकं गन्धं अनुकल्पयामि । चन्दन चढ़ा दे ॐ श्री गणेशाय नमः हं आकाश तत्त्वात्मकं पुष्पं अनुकल्पयामि । फूल चढ़ाए ॐ श्री गणेशाय नमः यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं अनुकल्पयामि। धूप जलाए ॐ श्री गणेशाय नमः रं वह्नयात्मकं दीपं अनुकल्पयामि । दीप दिखाए ॐ श्री गणेशाय नमः वं जल तत्त्वात्मकं नैवेद्यं अनुकल्पयामि । (फल / बताशा आदि नैवेद्य में रखे ) ॐ श्री गणेशाय नमः शं शक्त्यात्मकं सर्वोपचारं अनुकल्पयामि । फूल चढ़ाए।

अब गणेश जी को नमस्कार करे :

सर्व- विघ्नविनाशनाय सर्व-कल्याण हेतवे, पार्वती – प्रियपुत्राय श्रीगणेशाय नमो नमः ॥ गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारु-भक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्।

(3) अब हाथ में फूल लेकर बोले
ॐ भैरवाय नमः, अतितीक्ष्ण महाकाय कल्पांत दहनोपम, भैरवायनमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि । फूल शिवजी को चढ़ा दे। अब इष्टदेवी काली माँ का चित्र / मूर्ति/यन्त्र सामने रखकर उनको प्रणाम करे :

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ ॐ काली महाकाली कालिके परमेश्वरी । सर्वानन्दकरे देवी नारायणि नमोऽस्तुते ॥

(4) साधना के दिन यह संकल्प करे :
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ तत्सत् श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशति कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्यभूप्रदेशे- प्रदेशे संवत्सरे -मासे (नाम) अहं अद्य गुप्त नवरात्री प्रथम दिवसात प्रारभ्य (जितने दिन साधना करनी है उतने दिन का नाम ले) दिवस पर्यन्तम् श्रीकालिका देवी प्रीतये एकाक्षरी “क्रीं” मन्त्रस्य पुरश्चरणांतर्गते एक लक्ष जपम् कृत्वा तत्दशांशं होमं, होमस्य दशांशं तर्पणं, तर्पणस्यदशांशं मार्जनं, मार्जनस्य दशांशं ब्राह्मणान् कन्यान् वा सुवासिनीन् वा भोजयिष्ये।

(5) अब “क्रीं” मन्त्र से प्राणायाम करे
मन में 4 बार क्री जपकर नाक से श्वास अंदर को ले, अब 16 बार मन्त्र जपने तक श्वास को भीतर रोके रखे इसके बाद 8 बार जपते हुए श्वास बाहर निकाले। ये प्राणायाम कुल तीन बार करना है।

( 6 ) अब भूतशुद्धि
( शरीर स्थित पंचतत्वों की शुद्धि) करे अर्थात “ॐ हौँ” मन्त्र का 11 बार जप करे।

(7) दृष्टिसेतु :
नासाग्र अथवा भ्रूमध्य में दृष्टि रखते हुए 10 बार ॐ का जप करे। प्रणव के अनाधिकारी औं मन्त्र का 10 बार जप करे।

मन्त्र शिखा :
श्वास को भीतर लेकर कल्पना करे कि अपने मूलाधार में स्थित कुलकुण्डलिनी शक्ति क्रीं मन्त्र की शिखा है, यह सहस्रार में जा रही है फिर इसको कल्पना द्वारा सहस्रार से वापस मूलाधार में ले आये। इस तरह से कई दिन अभ्यास करते करते सुषुम्ना पथ पर विद्युत की तरह दीर्घाकार तेज प्रतीत होगा।

(9) मन्त्र चैतन्य :
“गुरुदेव, मन्त्र, काली माँ और अन्तरात्मा सब एक ही हैं” यह सोचे फिर “ईं क्रीं ईं” मन्त्र को 11 बार जपे।

(10) माँ काली का कवच पढ़े –
नारायण उवाच
श्रृणु वक्ष्यामि विप्रेन्द्र कवचं परमाद्भुतम् । नारायणेन यद् दत्तं कृपया शूलिने पुरा ॥ त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च । तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने ॥ दुर्वाससा च यद् दत्तं सुचन्द्राय महात्मने । अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम्॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। मे क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रीमिति लोचने ॥ ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु। क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तान् सदावतु ॥ ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातुमेऽधरयुग्मकम् । ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु ॥ ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु। ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातुसदा मम ॥

ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्षः सदावतु। ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥ ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्ठं सदावतु। रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥ ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु। ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु ॥ प्राच्यां पातु महाकाली चाग्नेय्यां रक्तदन्तिका। दक्षिणे पातु चामुण्डा नैर्ऋत्यां पातु कालिका ॥ श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका उत्तरे विकटास्या चा-प्यैशान्यां साट्टहासिनी ॥ पातूर्ध्वं लोलजिह्वा मायाऽऽद्या पात्वधः सदा । जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसूः सदा ॥ इति ते कथितं वत्स- सर्वमन्त्रौघ-विग्रहम् । सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम् ॥ सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोऽस्य प्रसादतः।

कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपतिः ॥ प्रचेता लोमेशश्चैव यतः सिद्धो बभूव हि । यतो हि योगिनां श्रेष्ठ: सौभरि: पिप्पलायन: ॥ यदि स्यात् सिद्धकवच: सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्। महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च ॥ निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कालीं जगत्प्रसूम्। शतलक्षंप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे नारद नारायण-संवादे भद्रकालीकवचम् ॐ तत्सत् ॥

(11) कुल्लुका:
“क्रीं हूं स्त्रीं फट्” मन्त्र को अपने शिखा स्थान पर स्पर्श करके 10 बार जपे।

(12) सेतु :
“ॐ” मन्त्र को ह्रदय में हाथ रखकर 10 बार जपे।

(13) महासेतु:
“क्रीं” मन्त्र को गले में हाथ रखकर 10 बार जपे।

(14) मुखशोधन :
“क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ॐ ॐ क्रीं क्रीं क्रीं” 7 बार बोलकर जपे।

(15) अब मंत्रार्थ की क्रिया करे अर्थात देवी काली का शरीर और मन्त्र अभिन्न है यह चिंतन करें।

(16) निर्वाण :
“अं क्रीं ॐ ऐं आं इं ईं उं ऊं ऋ ॠ लूं लूं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गंघं डंचं छं जं झं जं टं ठं डं ढंणं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वंशं षंसंहं क्षं ॐ” – १ बार नाभि को छूकर जपे ।

(17) प्राणयोग
“ह्रीं क्रीं ह्रीं” – 7 बार ह्रदय में जपे।

(18) दीपनी
“ॐ क्रीं ॐ” – 7 बार हृदय में जपे।

(19) निंद्रा भंग
“ईं क्रीं ईं” मन्त्र को हृदय में हाथ रखकर 10 बार जपे ।

(20) अशौचभंग
“ॐ क्रीं ॐ” 7 बार ह्रदय में जपे।

(21) विनियोग
आचमनी में थोड़ा जल लेकर बोले ॐ अस्य श्री काली एकाक्षरी मन्त्रस्य भैरव ऋषिः उष्णिक् छन्दः श्री दक्षिणकालिका देवता कं बीजं ईं शक्ति: रं कीलकम् श्रीदक्षिणकालिका देवी प्रीतये चतुर्वर्ग सिद्धयर्थे जपे विनियोगः बोलकर जल छोड़ दे

अब न्यास करे, मन्त्र बोलकर सम्बन्धित अंग को छुए:

ऋष्यादिन्यास – श्री महाकाल भैरव ऋषये नमः शिरसि ।

उष्णिक् छन्दसे नमः मुखे । ॐ श्रीदक्षिण कालिका देवतायै नमः हृदये। कं बीजाय नमः गुह्ये (फिर हाथ धोए)। ईं शक्तये नमः पादयोः। रं कीलकाय नमः नाभौ । कालिका देवी प्रीतये चतुर्वर्ग सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

(22) करन्यास
क्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः । क्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । क्रं मध्यमाभ्यां वषट्। क्रैं अनामिकाभ्यां हूं। क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । क्रः करतलकरपृष्ठाभ्याम् फट्।

(23) हृदय आदि न्यास:
क्रां हृदयाय नमः । क्रीं शिरसे स्वाहा । क्रं शिखायै वषट् । क्रैं कवचाय हुम्। क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । क्रः अस्त्राय फट् ।

(24) व्यापक न्यास
“क्रीं” मन्त्र से 3 बार सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर के अंगों में स्पर्श करे

(25) अब हाथ जोड़कर माँ काली का ध्यान करे
शवारुढ़ां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदाम् । हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्। मुक्त केशी ललज्जिह्वां पिबंती रुधिरं मुहुः । चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत् ॥

( शव पर खड़ी महाविशालकाय भयानक दिखने वाली, वरदान देने वाली, तीन नेत्र वाली माँ जोर जोर से हंस रही हैं और उनके हाथ में कपाल (नरमुंड ) है | उनके बाल बिखरे हुए और जीभ बाहर निकालकर रुधिर पी रही हैं। चार हाथों वाली माँ का हम स्मरण करते हैं जो भक्तों को वरदान और अभयदान देने वाली हैं।)

(26) माँ काली का पूजन
ॐ क्रीं कालिकायै नमः लं पृथ्वी तत्त्वात्मकं गन्धं कालिका देवी प्रीतये समर्पयामि । तिलक लगाए

ॐ क्रीं कालिकायै नमः हं

आकाश-तत्वात्मकं पुष्पं कालिका देवी प्रीतये समर्पयामि। फूल चढ़ाये

ॐ क्रीं कालिकायै नमः यं वायु तत्त्वात्मकं धूपं कालिका देवी प्रीतये आघ्रापयामि।

धूप दिखाए
ॐ क्रीं कालिकायै नमः रं वह्नितत्वात्मकं दीपं कालिका देवी प्रीतये दर्शयामि।

दीप दिखाए
ॐ क्रीं कालिकायै नमः वं जल तत्त्वात्मकं नैवेद्यं – कालिका देवी प्रीतये निवेदयामि। माँ को उत्तम नैवेद्य अर्पित करे

ॐ क्रीं कालिकायै नमः सं सर्व-तत्त्वात्मकं सर्वोपचाराणि मनसा परिकल्प्य कालिका देवी प्रीतये समर्पयामि। फूल चढा दे

(27) इसके उपरान्त योनि मुद्रा द्वारा क्रीं नमः बोलकर प्रणाम करना चाहिए।

(28) उत्कीलन
देवता की गायत्री 10 बार जपे। “ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोघोरा प्रचोदयात्।”

(29) जप:
यह मन्त्र एक लाख बार जप करने से सिद्ध होता है अर्थात कुल 1000 मालाएं जप करनी हैं

सुझाव 40 माला हर दिन जपे यानि 20 माला दिन में और 20 माला रात को जपे। 20 माला में 36 मिनट लग सकते हैं। इस तरह 4000 बार जप प्रतिदिन हो जाएगा। ऐसा 25 दिनों तक करना है तो ( 25 दिन 40 माला = 1000 माला) एक लाख जप पूरा हो जाएगा।

(30) पुन: कुल्लुका, सेतु, महासेतु, आशौचभंग का जप : ॐ महासेतु= “क्रीं” मन्त्र को कंठ में 10 बार जपे

ॐ सेतु = “ॐ” मन्त्र को ह्रदय में 10 बार जपे ॐ अशौचभंग = “ॐ क्रीं ॐ”

7 बार हृदय में जपे ॐ क्रीं से प्राणायाम करे = मन में 4 बार क्रीं जपकर नाक से श्वास अंदर को ले, अब 16 बार मन्त्र जपने तक श्वास को भीतर रोके रखे इसके बाद 8 बार जपते हुए श्वास बाहर निकाले ।

(31) जपसमर्पण
एक आचमनी जल लेकर निम्न मंत्र पढ़कर सारा मन्त्र जपकर्म देवी के बायें हाथ में अर्पित कर

दें ॐ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥ श्री

(32) क्षमायाचना
अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥1॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥2॥ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥3॥

शक्राय नमः शक्राय नमः शक्राय नमः – बोलकर आसन के नीचे जल छिड़के और माथे पर लगाए फिर बोले श्री विष्णवे नमः विष्णवे नमः विष्णवे नमः । –

(33) पुरश्चर्या के अन्य अंग:
जप तो उपरोक्त प्रकार से कर ले| जिस दिन सारा जप पूर्ण हो जाए “क्रीं कालीं नारिकेल बलिं समर्पयामि नमः” बोलकर काली माँ को नारियल तोड़कर सात्विक बलि के रूप में दे। हवन, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन भी करे –

सुझाव: हवन: “क्रीं स्वाहा” मन्त्र से अग्नि में कुल दस हजार बार हवन घी द्वारा करने को कहा गया है। यानि 25 दिनों तक हर दिन 400 बार आहुति दे।

तर्पण: “क्रीं नमः कालिकां तर्पयामि स्वाहा ” बोलकर रोली, चन्दन, दूध, चीनी, फूल, तिल मिश्रित पानी ( सम्भव हो तो गंगाजल) से कुल एक हजार बार कालिका देवी का तर्पण (अर्घ्य द्वारा या आचमनी से जल अर्पण) करें। यानि 25 दिनों तक हर दिन 40 बार तर्पण करें।

मार्जन

“क्रीं कालिका देवीं अभिषिंचामि नमः” बोलकर दूर्वा या कुश द्वारा कुल 100 बार मार्जन (अपने मस्तक पर जल छिड़कना) करना है।

ब्राह्मण भोजन
10 व्यक्तियों को भोजन कराए ये ब्राह्मण या सुहागिन औरतें भी हो सकती हैं। छोटी कन्याओं को तो अवश्य खिलाए। दक्षिणा भी दे

यदि पुरश्चर्या के किसी अंग (जैसे हवन) को करना सम्भव न हो तो उस अंग का दोगुना जप करे यदि अधिक सामर्थ्य है तो साधक उस अंग की पूर्ति के लिए उस अंग की संख्या का तीन गुना या चार गुना जप भी कर सकता है.. जैसे 10,000 (दस हजार = अयुत) बार होम करने में असमर्थ होने पर उसके स्थान पर दोगुना यानि 20,000(विंशत्यधिक सहस्र) बार एकाक्षरी मन्त्र का जप करना होगा, इसमें संकल्प इस प्रकार रहेगा –

विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ तत्सत् श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे भूप्रेदेशे प्रदेशे मासे पक्षे, तिथौ, वासरे गोत्रोत्पन्न (नाम) अहं अद्य दिवसात प्रारभ्य श्रीकालिका देवी प्रीतये श्री काली एकाक्षरी मन्त्रस्य पुरश्चरणस्य (या जितना जप किया है उसका उच्चारण करें) सांगता सिद्धयर्थे काली एकाक्षरी मन्त्रस्य अयुत संख्यक होमाभावे काली एकाक्षरी मन्त्रस्य विंशत्यधिक सहस्र संख्यक जपमहं करिष्ये ।

10,000 हवन की जगह 20,000 जप करने वाले को सुझाव है कि 25 दिन तक हर दिन 800 (8 माला) जप करे।

यह पूजा तथा मन्त्र जप को किसी के सामने प्रकट नहीं करे अर्थात गोपनीय रखे। पुरश्चरण काल में ब्रह्मचर्य रखे, किसी भी स्त्री के लिए बुरा व्यवहार न करे इस बात का ध्यान रहे। कुछ ग्रंथों में इसका 2 लाख व 3 लाख बार जप करने को भी कहा गया है। इसलिए एक बार पुरश्चरण हो जाने पर यदि अच्छे स्वप्न आदि शुभ संकेत मिले तो सिद्धि मिलने तक साधक फिर से पुरश्चरण करता जाय। पुरश्चरण के बाद भी इस मन्त्र को हर दिन एक-दो माला जपे तो अच्छा है।

देवी महाकाली भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रहों आदि के कारण उपजी हर प्रकार की बाधाएँ हर लेती हैं। अतः शिशु जैसा बनकर भक्ति भाव एवं सच्चे हृदय से काली माँ का ध्यान करते हुए माँ के मंत्रों का मानसिक जप करते रहना चाहिये। काली सहस्रनाम का सावधानीपूर्वक सच्चे हृदय से किया गया पाठ तुरन्त फल देने वाला होता है। इसके अलावा माँ काली के अष्टोत्तरशतनाम, अष्टक, कवच, हृदय आदि बहुत से सुंदर स्तोत्र हैं जिनका महाकाली की प्रीति हेतु पाठ किया जाना उत्तम है।

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