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05/04/2024

ABP Dharma Live

प्रतिष्ठा की तुलना में चरित्र के प्रति अधिक चिंतित रहें। क्योंकि प्रतिष्ठा तो मात्र सामाजिक प्रभाव है परंतु चरित्र आपकी ...
09/01/2024

प्रतिष्ठा की तुलना में चरित्र के प्रति अधिक चिंतित रहें। क्योंकि प्रतिष्ठा तो मात्र सामाजिक प्रभाव है परंतु चरित्र आपकी मूल वास्तविकता है। इसी कारण गोस्वामी जी ने श्रीराम के चरित्र को सर्वोपरि माना है। मर्यादा से ही चरित्र का निर्माण होता है। रोम रोम में बसने वाले राम को नमन।
रामचरण दास - कमल नंदलाल गोस्वामी

चली नाव गंगा की धारा.. सिया राम लखन को पार उतारा। प्रभु देने लगे नाव उतराई.. केवट कहे नहीं रागुराई। पार किया मैंने तुमको...
03/01/2024

चली नाव गंगा की धारा.. सिया राम लखन को पार उतारा। प्रभु देने लगे नाव उतराई.. केवट कहे नहीं रागुराई। पार किया मैंने तुमको.. अब तू मोहे पार करे... केवट के राम... रोम रोम में बसने वाले मेरे राम ❤️

Vastu Talk किस दिशा में हो घर का मंदिर?On FB, YouTube & IGTV📱📺💻Channel Kamal Nandlal👇🏾
24/05/2020

Vastu Talk
किस दिशा में हो घर का मंदिर?
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वास्तु टिप्स में आचार्य कमल नन्द लाल से जानिए किस दिशा में होना चाहिए घर का मंदिर .......................................

11/03/2013

Quotes From Inner Mind By Kamal Nandlal

08/02/2013

सभी मित्रों को राधे राधे

अनंत चतुर्दशी विशेष - गणेश पूजन Anant Chaturdashi Special - ganesh pooja
28/09/2012

अनंत चतुर्दशी विशेष - गणेश पूजन
Anant Chaturdashi Special - ganesh pooja

अनंत चतुर्दशी विशेष - गणेश पूजन
Anant Chaturdashi Special - ganesh pooja

पूजन प्रारंभ करने हेतु शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके, इष्ट देवता की दाहिनी दिशा में अक्षत बिछाकर उस पर रखे दें। दीपक प्रज्ज्वलित कर, हाथ धो लें।

दीप पूजन: (हाथ में गंध एवं पुष्प लेकर निम्न मंत्र बोलकर दीपक पर गंध-पुष्प अर्पित करें) मंत्र: "ॐ दीप ज्योतिषे नमः" प्रणाम करें। (उक्त मंत्र बोलकर गंध व पुष्प, दीपक पर अर्पित करें)

आचमन: (अब निम्न मंत्र बोलते हुए तीन बार आचमन करें)
मंत्र: ॐ केशवाय नमः स्वाहा (आचमन) ॐ नारायणाय नमः स्वाहा (आचमन) ॐ माधवाय नमः स्वाहा (आचमन)

हस्त प्रक्षालय: (निम्न मंत्र बोलकर हाथ धो लें)
मंत्र: ॐ हृषीकेशाय नमः हस्तम्‌ प्रक्षालयामि, तत्पश्चात तीन बार प्राणायाम करें।

पवित्रकरण: (प्राणायाम के बाद अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर निम्न मंत्र बोलते हुए जल छिड़कें)
मंत्र: ॐ अपवित्रह पवित्रो वा सर्व-अवस्थाम्‌ गतो-अपि वा। यः स्मरेत्‌ पुण्डरी-काक्षम्‌ स बाह्य-अभ्यंतरह शुचि-हि॥ ॐ पुण्डरी-काक्षह पुनातु।

स्वस्तिवाचन: स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध-श्रवाहा स्वस्ति नह पूषा विश्व-वेदाहा। स्वस्ति नह-ताक्ष्‌-र्यो अरिष्ट-नेमिति स्वस्ति नो बृहस्पतिहि-दधातु॥ द्यौहो शन्ति-हि-अन्तरिक्ष (गुं) शान्तिर्-हि शान्तिहि-आपह। शान्ति हि ओषधयह्‌ शान्तिहि। वनस्‌-पतयह-शान्तिहि विश्वे देवाहा शान्तिहि ब्रह्म शान्तिहि सर्व (गुं) शान्ति हि एव शान्तिहि सा मा शान्ति हि- ऐधि॥ यतो यतह समिहसे ततो न अभयम्‌ कुरु। शम्‌ नह कुरु प्रजाभ्योअभयम्‌ नह पशुभ्यहा॥ सुशान्तिहि भवतु । श्रीमन्‌ महागण अधिपतये नमह। लक्ष्मी-नारायणाभ्याम्‌ नमह। उमामहेश्वराभ्याम्‌ नमह। मातृ पितृ चरण कमलैभ्यो नमह। इष्ट-देवताभ्यो नमह। कुलदेवताभ्यो नमह। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमह। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमह।

स्तोत्र पाठ: सुमुखह एक-दन्तह च। कपिलो गज-कर्णकह। लम्बोदरह-च विकटो विघ्ननाशो विनायकह॥1॥
धूम्रकेतुहु-गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननह। द्वादश-एतानि नामानि यह पठेत्‌ श्रृणुयात-अपि॥2॥
विद्या-आरम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे च-एव विघ्न-ह-तस्य न जायते॥3॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटि-सूर्य-समप्रभ। निर-विघ्नम्‌ कुरु मे देव सर्व-कार्येषु सर्वदा॥4॥

संकल्प: (दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले):
मंत्र: "ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे ---*--- नगरे ---**--- ग्रामे वा बौद्धावतारे विजय नाम संवत्सरे श्री सूर्ये दक्षिणायने वर्षा ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ भाद्रप्रद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्याम्‌ तिथौ भृगुवासरे हस्त नक्षत्रे शुभ योगे गर करणे तुला राशि स्थिते चन्द्रे सिंह राशि स्थिते सूर्य वृष राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ -- +-- गौत्रः --++-- अमुक शर्मा, वर्मा, गुप्ता, दासो ऽहं मम आत्मनः श्रीमन्‌ महागणपति प्रीत्यर्थम्‌ यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये।" इसके पश्चात्‌ हाथ का जल किसी पात्र में छोड़ देवें।

गणपति पूजन प्रारंभ
आवाहन: गंधाक्षत दाहिने हाथ में लेकर निम्न मंत्र बोलकर आवाहन करें
मंत्र: नागास्यम्‌ नागहारम्‌ त्वाम्‌ गणराजम्‌ चतुर्भुजम्‌। भूषितम्‌ स्व-आयुधै-है पाश-अंकुश परश्वधैहै॥
आवाह-यामि पूजार्थम्‌ रक्षार्थम्‌ च मम क्रतोहो। इह आगत्व गृहाण त्वम्‌ पूजा यागम्‌ च रक्ष मे॥
ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धिसहिताय गण-पतये नमह, गणपतिम्‌-आवाह-यामि स्थाप-यामि।
(गंधाक्षत अर्पित करें।)

प्रतिष्ठा: आवाहन के पश्चात देवता का निम्न मंत्र बोलते हुए प्रतिष्ठा करें।
मंत्र: अस्यै प्राणाहा प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाह क्षरन्तु च। अस्यै देव-त्वम्‌-अर्चायै माम-हेति च कश्चन॥ ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहित-गणपते सु-प्रतिष्ठितो वरदो भव।

आसन अर्पण: इसके बाद निम्नलिखित मंत्र पढ़कर पुष्प अर्पित करें
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, आसनम्‌ समर्पयामि।

पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय, स्नानीय, पुर-आचमनीय-अर्पण: उक्त मंत्र बोलकर 5 बार जल छोड़ते जाएँ
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, एतानि पाद्य,ऽर्ध्य, आचमनीय, स्नानीय, पुनर-आचमनीययानि समर्पयामि ।' (उक्त मंत्र बोलकर जल छोड़ दें)

पञ्चामृत स्नान: (पश्चात्‌ नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर पंचामृत से गणपति देव को स्नान कराएँ)
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, पंचामृत-स्नानम्‌ समर्पयामि। पंचामृत-स्नान-अन्ते शुद्ध-उदक-स्नानम्‌ समर्पयामि।

शुद्धोदक स्नान: पश्चात्‌ निम्न मंत्र बोलते हुए शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, शुद्ध-उदक स्नानम्‌ समर्पयामि।

वस्त्र-उपवस्त्र समर्पण: निम्न मंत्र बोलते हुए वस्त्र & उपवस्त्र समर्पित करें
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, वस्त्रम्‌-उपवस्त्र समर्पयामि।

यज्ञोपवित समर्पण: निम्न मंत्र बोलते हुए यज्ञोपवित समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, यज्ञो-पवीतम्‌ समर्पयामि॥

गन्ध: निम्न मंत्र बोलते हुए गन्ध समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, गन्धम्‌ समर्पयामि।

अक्षत: निम्न मंत्र बोलते हुए अक्षत समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, अक्षतान्‌ समर्पयामि।

पुष्पांजलि: एवं पुष्प: निम्न मंत्र बोलते हुए पुष्पमाला एवं पुष्प समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, पुष्पमालाम्‌ समर्पयामि।

दूर्वांकुर: निम्न मंत्र बोलते हुए दूर्वा समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, दूर्वांकुरान्‌ समर्पयामि ॥

सुगंधित धूप: निम्न मंत्र बोलते हुए सुगंधित धूप दिखाएँ।
मंत्र: ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, धूपम्‌ आघ्रापयामि ।

दीप-दर्शन: निम्न मंत्र बोलते हुए दीप दिखाएँ।
मंत्र: ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, दीपं दर्शयामि ।

(हाथ धोलें)

नैवेद्य निवेदन: विभिन्न नैवेद्य में मोदक, ऋतु के अनुकूल उपलब्ध फल अर्पित करें। नैवेद्य वस्तु का पहले शुद्ध जल से प्रोक्षण करें। धेनु-मुद्रा दिखाकर देवता के सम्मुख स्थापित करें। निम्नांकित मंत्र बोलें।
मंत्र: शर्करा-खण्ड-खाद्यानि दधि-क्षीर-घृतानि च। आहारम्‌ भक्ष्य-भोज्यम्‌ च नैवेद्यम्‌ प्रति-गृह्यताम्‌॥ ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, नैवेद्यम्‌ मोदक-मयम्‌ ऋतुफलानि च समर्पयामि। ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, आचमनीयम्‌ मध्ये पानीयम्‌ उत्तरा-पोशनम्‌ च समर्पयामि।

नारियल & दक्षिणा: निम्न मंत्र बोलते हुए नारियल & दक्षिणा समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह, दक्षिणा व नारिकेल-फलम्‌ समर्पयामि।

नीराजन (आरती): ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि बुद्धि सहित महागणपति आपको नमस्कार है। ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, कर्पूर-नीराजनम्‌ समर्पयामि॥ (प्रणाम करें, आरती पश्चात हाथ अवश्य धोएँ)
पुष्पाञ्जलि समर्पण: निम्न मंत्र बोलते हुए पुष्प समर्पित करें।
मंत्र: ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, मन्त्र-पुष्प-अंजलि समर्पयामि।

प्रदक्षिणा व क्षमाप्रार्थना:
यानि कानि च पापानि ज्ञात-अज्ञात-कृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण-पदे पदे॥
आवाहनम्‌ न जानामि न जानामि तवार्चनाम्‌ । यत्‌-पूजितम्‌ मया देव परि-पूर्णम्‌ तदस्तु मे ॥
अपराध सहस्त्राणि-क्रियंते अहर्नीशं मया । तत्‌सर्वम्‌ क्षम्यताम्‌ देव प्रसीद परमेश्वर ॥

पूजाकर्म समर्पण: अनया पूजया सिद्धि बुद्धि सहिता । महागणपति प्रियताम्‌ न मम्‌ ॥ ॐ ब्रह्मार्पणमस्तु । ॐ आनंद ! ॐ आनंद !! ऊँ आनंद !!!

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आचार्य कमल नंदलाल गोस्वामी
Web: http://AstroLotus.com
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Tags: Ganpati Visarjan, Ganesha, Lord Vinayaka Worship, Mumbai Ganpati, Hindu Gods, Lal Bagh Ka Raja, Lord Ganesha

22/09/2012

Happy Ganesh Chaturthi - गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई

Ashtavinayaka अष्टविनायक: Eight Incarnations of Lord Ganesha
भगवान श्री गणेश मंगलमूर्ति रुप में प्रथम पूज्य हैं. पुराणों व अन्य धर्म ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है की भगवान ब्रह्मदेव ने भविष्यवाणी की थी कि हर युग में श्री गणेश विभिन्न रुप में अवतरित होंगे. कृतयुग में विनायक, त्रेतायुग में मयूरेश्वर, द्वापरयुग में गजानन एवं धूम्रकेतु नाम से कलयुग में अवतार लेंगे. और इसी धार्मिक महत्व से जुड़ी है अष्टविनायक यात्रा. अष्ट विनायक यात्रा श्री गणपति भगवान के आठ शक्ति केंद्रों की पवित्र यात्रा हैं जिसका विशेष विधान रहा है. सभी श्रद्धालु तीर्थयात्री जीवन में कम से कम एक बार यहां आने की कामना रखते हैं. यह स्थल श्रीगणेश के आठ प्रमुख रूपों के दर्शन हेतु प्रसिद्ध हैं. इन अष्ट अवतारों में सृष्टि के सुख की कल्पना का आधार है. भगवान गणेश जी के आठों शक्तिपीठ महाराष्ट्र में ही हैं. दैत्य प्रवृत्तियों के उन्मूलन हेतु उसी प्रकार के ईश्वरीय अवतार हैं जिस तरह श्रीराम एवं श्रीकृष्ण के थे. पौराणिक महत्व से संबंध रखती यह अष्टविनायक यात्रा महाराष्ट्र में पुणे के समीप स्थित है. मंदिरों का पौराणिक महत्व एवं इतिहास पूर्ण रूप से ज्ञात होता है और यहां विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू मानी जाती है अर्थार्थ यह मूर्तियां स्वयं प्रकट हुई हैं इनका स्वरूप प्राकृतिक माना गया है. इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के क्रम अनुसार ही अष्टविनायक की यात्रा भी की जाती है. इनमें से 6 गणपति मंदिर पुणे में तथा 2 रायगढ़ जिले में स्थित हैं. अष्ट विनायक की यात्रा आध्यात्मिक सुख, आनंद की प्राप्ति हैं. अष्टविनायक दर्शन कीशास्त्रोक्त क्रमबद्धता इस प्रकार है:

1. मयूरेश्व (Mayureshwar): कहा जात है कि मोरगांव का यह मंदिर स्वयं ब्रह्माजी ने बनवाया था यह भगवान गणेश का स्वानंद लोक था. देवताओं को दैत्यराज सिंधु के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने हेतु श्रीगणेश ने मयूरेश्वर का अवतार लिया था. गणपति ने माता पार्वती से कहा कि माता मैं विनायक दैत्यराज सिंधु का वध करूंगा तब भोलेनाथ ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कार्य निर्विघ्न पूरा होगा तब मोर पर बैठकर गणपति ने दैत्य सिंधु की नाभि पर वार किया तथा उसका अंत कर देवताओं को विजय दिलवाई इसलिए उन्हें मयूरेश्वर की पदवी प्राप्त हुई. मयूरेश्वर को मोरेश्वर भी कहते हैं यह मंदिर यह महाराष्ट्र के पुणे में बारामती तालुका में करहा नदी के किनारे स्थित है. यह क्षेत्र भूस्वानंद के नाम से भी जाना जाता है जिसका तात्पर्य सुख समृद्ध भूमि से है यह क्षेत्र मोर के समान आकार लिए हुए है.

2. सिद्धिविनायक (Siddhivinayak): सिद्धटेक महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की करजत तहसील में भीम नदी के किनारे स्थित है. मान्यता है की यहां सिद्धटेक पर्वत था और इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने तप द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी. कहते हैं जब सृ्ष्टि की रचना करते समय भगवान विष्णु को नींद आ गई तब भगवान श्री विष्णु के कानों से दो दैत्य मधु व कैटभ बाहर आ गए व उत्पात मचाने लगे देवताओं को परेशान करने लगे. दैत्यों के आंतक से मुक्ति पाने हेतु देवताओं ने श्री विष्णु जी की आराधना की तब श्री विष्णु शयन से जागे और दैत्यों को मारने की कोशिश की. परन्तु वे असफल रहें तब भगवान विष्णु ने शिव की अराधना की श्री विष्णु कि पुकार सुनकर भगवान शिव प्रकट हुए और शिव के अनुसार जब तक श्री गणेश का आशिर्वाद प्राप्त नहीं होता यह कार्य पूर्ण नही होग. तब भगवान विष्णु जी ने श्री गणेश का आहवान किया जिससे श्री गणेश जी प्रसन्न हुए और दैत्यों का संहार हुआ. इस कार्य उपरांत भगवान विष्णु ने पर्वत के शिखर पर मंदिर का निर्माण किया तथा भगवान गणेश कि मूर्ति स्थापित की व ब्रहा जी ने बाधारहित होकर सृ्ष्टि की रचना की तभी से यह स्थल सिद्धटेक नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इसी स्थान पर ऋषि व्यास ने भी तपस्या की थी. अष्टविनायक में से एक सिद्धविनायक को परम शक्तिमान माना जाता है.

3. बल्लालेश्वर (Ballaleshwar): राजगढ़ जिले के पाली गांव का यह मंदिर भक्त बल्लाल के नाम से प्रसिद्ध है. अष्टविनायकों में ये एकमात्र गणपति हैं जो धोती-कुर्ता जैसे वस्त्र पहने हुए हैं क्योंकि उन्होंने भक्त बल्लाल को ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए थे. इस अष्टविनायक की महिमा का बखान मुद्गल पुराण में किया गया है. मान्यता है कि बल्लाल नाम के व्यक्ति कि भक्ति से प्रसन्न हो भगवान श्री गणेश उसी मूर्ति में विराजमान हो गए जिसकी पूजा बल्लाल किया करता था. अष्टविनायकों में श्री बल्लालेश्वर ही भगवान गणेश का वह रूप है जो भक्त के नाम से जाना जाता है. पुराणों में भगवान श्री बल्लालेश्वर भक्तों के रक्षक है. वेदों में इनकी महिमा का बखान किया गया है.

4. वरदविनायक (Vardvinayak): वरदविनायक मंदिर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कोल्हापुर तालुका के गांव महाड में स्थित है. मान्यता है की इस पावन स्थल पर सभी की मनोकामनएं पूर्ण होती हैं. मनोवांछित इच्छा पूरी करने वाले इस मंदिर में एक नंदादीप नामक एक दीपक निरंतर प्रज्जवलित है और अखंडित रुप से जल रहा है. प्राचीन समय मे इस स्थान को भद्रक नाम से भी जाना जाता था. इसके साथ ही मान्यता है कि पुष्पक वन में गृत्समद ऋषि के तप से प्रसन्न हो भगवान श्री गणपति ने उन्हें ' गणानां त्वां ' मंत्र के रचयिता की पदवी यहीं पर दि थी और ईश देवता बना दिया उन्हीं वरदविनायक गणपति का यह स्थान है. ऐसी श्रद्धा है की यहां पर वरदविनायक गणेश का नाम लेने से ही सारी कामनाओं को पूरा होने का वरदान प्राप्त होता है. इसके साथ ही शुक्लपक्ष की मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी के समय वरदविनायक चतुर्थी का व्रत एवं पूजन करने का विशेष विधान है. शास्त्रों अनुसार वरदविनायक चतुर्थी का साल भर नियमपूर्वक व्रत करने से संपूर्ण मनोभिलाषा पूर्ण होती है.

5. चिंतामणी Chintamani, Karnataka: महाराष्ट्र के पुणे मे हवेली तालुका के थेऊर नामक गांव में चिंतामणी गणेश का प्रसिद्ध मंदिर है. भगवान श्री गणेश को यहाँ पर चिंतामणी के नाम से पुजा जाता है. चिंतामणि से तात्पर्य है की भगवान गणेश सभी चिंताओं का नाश कर मन को शांति प्रदान करते हैं यह गांव मुलमुथा नदी के किनारे स्थित है जहां का वातावरण भी हृदय को आनंद से भर देता है. इस पवित्र भूमि पर आते ही मन की सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं. यह मंदिर एक ऎसा स्थान है जहाँ चिंतामणि रत्न की प्राप्ति साकार रूप मे होती है.

6. गिरिजात्मज (Girijatmaj): गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर कुकड़ी नदी के किनारे उत्तरी पुणे के लेण्याद्री गांव में स्थित है. पुराणों अनुसार यहीं पर देवी पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या कि थी तथा गणेश को पुत्र रूप मे पाया. यहीं पर लेण्यादि में पंदह वर्षों तक बाललीलाएं करने वाले गिरिजात्मक गणेश जी ने अनेक दैत्यों का संहार किया था. मान्यता है की प्राचीन काल मे इस स्थान का नाम जीरनापुर या लेखन पर्वत भी था. गिरिजा माता पार्वती का ही एक अन्य नाम रहा है तथा आत्मज का अर्थ है पुत्र अत: गिरिजात्मज का मतलब माता पार्वती के पुत्र से है. अष्टविनायक का यह एकमात्र मंदिर है जो ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. इस स्थान पर अनेक गुफाएं भी हैं.

7. विघ्रेश्वर (Vighneshwar): अष्टविनायक का यह मंदिर कुकदेश्वर नदी के किनारे ओझर नामक जगह पर बना हुआ है कहते हैं कि यहां पर गणेश भगवान द्वारा विघ्रेश्वर नामक दैत्य का संहार किया गया था जिस कारण श्री गणेश को विघ्रेश्वर विनायक नाम प्राप्त हुआ. एक अन्य कथा के अनुसार विघनसुर ने अभयदान की प्रार्थना करते हुए गणेस भगवान से यह वर मांगा कि गणेशजी के नाम के पहले उसका नाम भी लिया जाए अत: इस कारण गणपति का एक अन्य नाम विघ्नेश्वर पडा़ और भगवान श्री गणेश सभी विघ्रों को नष्ट करने वाले माने गए.

8. महागणपती (Mahaganapati): यह मंदिर रांजणगांव में है. भगवान शिव से विजय का वरदान पाने के उपरांत गणेश भगवान ने दैत्यत्रिपुरासुर का वध किया था इसलिए इस मंदिर का नाम त्रिपुरारिवरदे महागणपति पडा़. महागणपति अष्टभुजा, द्वादशभुजा वाले माने जाते हैं. उनकी इस मूर्ति की दस सूंड़ें व बीस भुजाएं हैं.


भगवान के यह अष्ट रूप उनकी महिमा और उदारता के उदाहरण हैं. वेदों, पुराणों में श्री गणेश की महिमा का विस्तृत रुप से वर्णन किया गया है. ऋग्वेद में कहा गया है ‘न ऋते त्वम क्रियते किं चनारे’ अर्थात हे गणपति महाराज तुम्हारे बिना कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है. तुम्हें वैदिक देवता की उपाधि प्राप्त है तथा वैदिक ऋचाओं में उनका अस्तित्व रहा है. गणेश आदिदेव है उनका सम्पूर्ण व्यक्तिव प्रभावी गुणों से युक्त है. गणेशजी के सभी रूप एवं प्रतीक यह दर्शाते हैं कि हम अपनी बुद्धि को जाग्रत रखें, अच्छी-बुरी बातों को ग्रहण करें, पापों का शमन करें तथा तमोगुण को दूर कर सत्वगुणों का विस्तार करें.
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