RSS Abhishek Soni

RSS Abhishek Soni राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ RSS सिकंदरपुर नगर

07/03/2026
जीवनकाल में हम जिनसे भी कुछ सीखते हैं, वे सभी हमारे शिक्षक होते हैं और हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं में आगे बढ़ने का मार्...
05/09/2025

जीवनकाल में हम जिनसे भी कुछ सीखते हैं, वे सभी हमारे शिक्षक होते हैं और हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं में आगे बढ़ने का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए, शिक्षक का दर्जा केवल किसी एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं होना चाहिए।

अभी तो शुरुआत है, और यह यात्रा कब समाप्त होगी, यह किसी को नहीं पता, लेकिन हमें उम्मीद और उत्साह से भरा हुआ होना चाहिए।
22/08/2025

अभी तो शुरुआत है, और यह यात्रा कब समाप्त होगी, यह किसी को नहीं पता, लेकिन हमें उम्मीद और उत्साह से भरा हुआ होना चाहिए।

राष्ट्रनिर्माण की परिकल्पना केवल संसद भवन, विधानसभा या किसी बड़े सरकारी पद तक सीमित नहीं है। वास्तव में राष्ट्रनिर्माण क...
21/08/2025

राष्ट्रनिर्माण की परिकल्पना केवल संसद भवन, विधानसभा या किसी बड़े सरकारी पद तक सीमित नहीं है। वास्तव में राष्ट्रनिर्माण की जड़ें उस धरातल पर पाई जाती हैं जहाँ से समाज का असली जीवन शुरू होता है—हमारे नगर, गाँव, गली और मोहल्लों में। किसी संवैधानिक पद या विशिष्ट स्थान पर बैठे बिना भी एक सामान्य नागरिक राष्ट्रनिर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

यदि हम नगर पंचायत सिकंदरपुर के संदर्भ में देखें तो यह और भी स्पष्ट होता है। सिकंदरपुर की पहचान एक ऐसे नगर के रूप में है जहाँ विविधता, संघर्षशीलता और जीवंतता का संगम मिलता है। यहाँ का हर नागरिक चाहे वह व्यापारी हो, छात्र हो, शिक्षक हो, किसान हो या फिर गृहणी—अपने-अपने स्तर पर योगदान देकर समाज और नगर को बेहतर बना सकता है।

राष्ट्रनिर्माण का पहला कदम स्थानीय समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करना है। नगर पंचायत सिकंदरपुर में स्वच्छता, जलभराव, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, बेरोजगारी और सामाजिक सौहार्द जैसी अनेक चुनौतियाँ मौजूद हैं। यदि नागरिक मिलकर इन मुद्दों को प्राथमिकता दें और सक्रियता से कार्य करें तो ये समस्याएँ कम होंगी और नगर एक आदर्श स्वरूप में सामने आएगा।

उदाहरण के तौर पर—

यदि मोहल्ले के युवा मिलकर साफ़-सफाई का अभियान चलाएँ तो नगर स्वच्छता की ओर अग्रसर होगा।

यदि अभिभावक बच्चों की शिक्षा और नैतिक संस्कार पर ध्यान दें तो भविष्य की पीढ़ी अधिक जागरूक और जिम्मेदार बनेगी।

यदि व्यापारी वर्ग ईमानदारी से व्यापार करें और उपभोक्ता हितों का ध्यान रखें तो नगर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।

यदि आम नागरिक भ्रष्टाचार, अन्याय और अव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाए तो प्रशासनिक तंत्र अधिक उत्तरदायी होगा।

राष्ट्रनिर्माण का मतलब बड़े–बड़े प्रोजेक्ट या सरकारी नीतियों से नहीं है। यह छोटी-छोटी पहल से शुरू होता है। नगर पंचायत सिकंदरपुर यदि संगठित होकर इन प्रयासों को अपनाए तो यह बलिया जिले में और पूरे प्रदेश के लिए एक आदर्श नगर बन सकता है।

हम सबको यह समझना होगा कि देश का भविष्य संसद या विधानसभा की चारदीवारी में ही तय नहीं होता। यह हमारे गली–मोहल्ले, स्कूल–कॉलेज और पंचायत स्तर पर लिखा जाता है। जिस दिन नगर पंचायत सिकंदरपुर का हर नागरिक यह संकल्प लेगा कि "मैं अपनी इच्छाशक्ति और जिम्मेदारी से समाज के सुधार के लिए काम करूंगा", उसी दिन से असली राष्ट्रनिर्माण की नींव और मजबूत होगी।

इसलिए, आइए हम सभी मिलकर यह प्रण लें कि हम पद और प्रतिष्ठा की सीमाओं से ऊपर उठकर अपने नगर के सुधार और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए योगदान देंगे।

20/08/2025

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर, CHC की वर्तमान स्थिति क्या हैं?

बागी बलिया और मेरे दादाजी की कहानी (बलिया बलिदान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।) आज बलिया बलिदान दिवस है। इस दिन की गूँज सु...
19/08/2025

बागी बलिया और मेरे दादाजी की कहानी (बलिया बलिदान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।)

आज बलिया बलिदान दिवस है। इस दिन की गूँज सुनते ही मेरे मन में अपने दादाजी श्री मंगल प्रसाद की यादें ताज़ा हो जाती हैं। दादा जी अब 99 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं और पाँचवी पीढ़ी को अपने आशीर्वाद से सींच रहे हैं। उम्र का तकाजा है, लेकिन स्मृतियों में आज़ादी और संघर्ष की छवियाँ आज भी जस की तस बसी हुई हैं।

दादा जी बताते हैं कि जब अंग्रेज़ों का आतंक बलिया की धरती पर फैला हुआ था, तब गांव-गांव में भय का वातावरण था। जैसे ही अंग्रेज़ सैनिक गांव में कदम रखते, लोग घर-बार छोड़ भाग जाते। अपनी पूँजी, अनाज और ज़रूरी सामान को मिट्टी में गाड़कर सुरक्षित करने की कोशिश करते। कई बार यह भी हुआ कि लोग भूखों मर गए या अंग्रेज़ों की गोलियों का शिकार बन गए।

दादा जी एक वैश्य परिवार से थे। दिल में देशप्रेम तो था, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी और बच्चों के भविष्य की चिंता उन्हें रोक लेती थी। वे साफ कहते हैं –
“हमने आज़ादी की लड़ाई में कोई बड़ा योगदान नहीं दिया। दिल चाहता था, लेकिन हालात और परिवार के डर ने हमें पीछे रोक लिया।”

यह दादा जी की ईमानदारी है, क्योंकि उस दौर में बहुत से लोग स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय न रहते हुए भी खुद को “स्वतंत्रता सेनानी” कहलवाने लगे। लेकिन दादा जी हमेशा सच बोलते हैं कि “हमने जेल नहीं काटी, संघर्ष नहीं किया, केवल हालात देखकर चुप रहे।”

फिर भी, रिश्तेदारी और समाज में कई वीर सेनानी थे जिन्होंने बलिया का नाम अमर कर दिया। दादाजी अक्सर अपने मामा के लड़के श्री उमाशंकर सोनार का ज़िक्र करते हैं। बलिया के ओकडेनगंज गंज चौक पर उनकी मूर्ति आज भी खड़ी है। वे बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने उमाशंकर जी को बुरी तरह प्रताड़ित किया था—उन्हें आग के ऊपर उल्टा लटकाकर यातनाएँ दी गईं और अंततः उनकी शहादत हो गई।

यह घटना दादा जी को भीतर तक झकझोर गई थी। लेकिन परिवार के डर ने उन्हें सक्रिय रूप से संघर्ष में उतरने से रोका।

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Sikandarpur
Ballia
277303

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